"गाँजा" के अवतरणों में अंतर

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नारी पौधों से जो रालदार स्राव निकलता है उसी को हाथ से काछकर अथवा अन्य विधियों से संगृहीत किया जाता है। इसे ही चरस या 'सुल्फा' कहते हैं। ताजा चरस गहरे रंग का और रखने पर भूरे रंग का हो जाता है। अच्छी किस्म के चरस में ४० प्रतिशत राल होती है। वायु के संपर्क में रखने से इसकी मादकता क्रमश: कम होती जाती है। रेज़िन स्राव पुष्पित अवस्था में कुछ पहले निकलना प्रारंभ होता है और गर्भाधान के बाद बंद हो जाता है। इसलिये गाँजा या चरस के खेतों से नर पौधों को छाँट छाँटकर निकाल दिया जाता है। प्राय: शीततर प्रदेशों में यह स्राव अधिक निकलता है। इसलिये चरस का आयात [[भारत]] में बाहर से प्राय: [[यारकंद]] से [[तिब्बत]] मार्ग द्वारा, होता रहा है।
 
वस्तुतः चरस गाँजे के पेड़से निकला हुआ एक प्रकार का गोद या चेप है जो देखने में प्रायः [[मोम]] की तरह का और हरे अथवा कुछ पीले रंग का होता है और जिसे लोग गाँजे या तंबाकू की तरह पीते हैं ।हैं। नशे में यह प्रायः गाँजे के समान ही होता है ।है। यह चेप गाँजे के डंठलों और पत्तियों आदि से उत्तरपश्चिम हिमालय में नेपाल, [[कुमाऊँ]], [[काश्मीर]] से [[अफगानिस्तातान]] और तुर्किस्तान तक बराबर अधिकता से निकलता है, और इन्ही प्रदेशों का चरस सबसे अच्छा समझा जाता है। बंगाल, मध्यप्रदेश आदि देशों में और योरप में भी, यह बहुत ही थोड़ी मात्रा में निकलता है।
 
गाँजे के पेड़ यदि बहुत पास पास हों तो उनमें से चरस भी बहुत ही कम निकलता है ।है। कुछ लोगों का मत है कि चरस का चेप केवल नर पौधों से निकलता है ।है। गरमी के दिनों में गाँजे के फूलने से पहले ही इसका संग्रह होता है ।है। यह गाँजे के डंठलों को हावन दस्ते में कूटकर या अधिक मात्रा में निकलने के समय उस पर से खरोचकर इकट्ठा किया जाता है ।है। कहीं कहीं चमड़े का पायजामा पहनकर भी गाँजे के खेतों में खूब चक्कर लगाते हैं जिससे यह चेप उसी चमड़े में लग जाता है, पीछे उसे खरोचकर उस रूप में ले आते हैं जिसमें वह बाजारों में बिकता है ।है। ताजा चरस मोम की तरह मुलायम और चमकीले हरे रंग का होता है पर कुछ दिनों बाद वह बहुत कड़ा और मटमैले रंग का हो जाता है ।है। कभी कभी व्यापारी इसमें [[तीसी]] के तेल और गाँजे की पत्तियों के चूर्ण की मिलावट भी देते हैं ।हैं। इसे पीते ही तुरंत नशा होता है और आँखें बहुत लाल हो जाती हैं ।हैं। यह गाँजे और भाँग की अपेक्षा बहुत अधिक हानिकारक होता है और इसके अधिक व्यवहार से मस्तिष्क में विकार आ जाता है ।है। पहले चरस मध्यएशिया से चमड़े के थैलों (या छोटे छोटे चरसों) में भरकर आता था ।था। इसी से उसका नाम चरस पड़ गया ।गया।
 
== भाँग ==