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भक्ति का तात्विक विवेचन वैष्णव आचार्यो द्वारा विशेष रूप से हुआ है। वैष्णव संप्रदाय भक्तिप्रधान संप्रदाय रहा है। श्रीमद्भागवत और श्रीमद्भगवद्गीता के अतिरिक्त वैष्णव भक्ति पर अनेक श्लोकबद्ध संहिताओं की रचना हुई। सूत्र शैली में उसपर नारद भक्तिसूत्र तथा शांडिल्य भक्तिसूत्र जैसे अनुपम ग्रंथ लिखे गए। पराधीनता के समय में भी महात्मा रूप गोस्वामी ने भक्तिरसायन जैसे अमूल्य ग्रंथों का प्रणयन किया। भक्ति-तत्व-तंत्र को हृदयंगम करने के लिए इन ग्रंथों का अध्ययन अनिवार्यत: अपेक्षित है। [[बल्लभाचार्य|आचार्य वल्लभ]] की [[भागवत]] पर [[सुबोधिनी टीका]] तथा [[नारायण भट्ट]] की भक्ति की परिभाषा इस प्रकार दी गई है :
 
: सवै पुंसां परो धर्मो यतो भक्ति रधोक्षजे ।रधोक्षजे।
:अहैतुक्य प्रतिहता ययात्मा संप्रसीदति ।।संप्रसीदति।। ११.२.६
 
भगवान् में हेतुरहित, निष्काम एक निष्ठायुक्त, अनवरत प्रेम का नाम ही भक्ति है। यही पुरुषों का परम धर्म है। इसी से आत्मा प्रसन्न होती है। 'भक्तिरसामृतसिंधु', के अनुसार भक्ति के दो भेद हैं: गौणी तथा परा। गौणी भक्ति साधनावस्था तथा परा भक्ति सिद्धावस्था की सूचक है। गौणी भक्ति भी दो प्रकार की है : वैधी तथा रागानुगा। प्रथम में शास्त्रानुमोदित विधि निषेध अर्थात् मर्यादा मार्ग तथा द्वितीय में राग या प्रेम की प्रधानता है। आचार्य वल्लभ द्वारा प्रतिपादित विहिता एवं अविहिता नाम की द्विविधा भक्ति भी इसी प्रकार की है और मोक्ष की साधिका है। शांडिल्य ने सूत्रसंख्या १० में इन्हीं को इतरा तथा मुख्या नाम दिए हैं।
श्रीमद्भागवत् में नवधा भक्ति का वर्णन है :
 
: श्रवणं कीर्तन विष्णो: स्मरणं पादसेवनम् ।पादसेवनम्।
: अर्चनं वंदनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ।।सख्यमात्मनिवेदनम्।। ७,५,२३
 
[[नारद भक्तिसूत्र]] संख्या ८२ में भक्ति के जो एकादश भेद हैं, उनमें गुण माहात्म्य के अंदर [[नवधा भक्ति]] के श्रवण और कीर्तन, पूजा के अंदर अर्चन, पादसेवन तथा वंदन और स्मरण-दास्य-सख्य-आत्मनिवेदन में इन्हीं नामोंवाली भक्ति अंतभुर्क्त हो जाती है। रूपासक्ति, कांतासक्ति तथा वात्सल्यासक्ति भागवत के नवधा भक्तिवर्णन में स्थान नहीं पातीं।