"राग हंसध्वनि" के अवतरणों में अंतर

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राग हंसध्वनि कनार्टक पद्धति का राग है परन्तु आजकल इसका उत्तर भारत मे भी काफी प्रचार है ।है। इसके थाट के विषय में दो मत हैं कुछ विद्वान इसे बिलावल थाट तो कुछ [[कल्याण थाट]] जन्य भी मानते हैं ।हैं। इस राग में मध्यम तथा धैवत स्वर वर्जित हैं अत: इसकी जाति औडव-औडव मानी जाती है ।है। सभी शुद्ध स्वरों के प्रयोग के साथ ही [[पंचम]] रिषभ,[[रिषभ]] निषाद एवम षडज पंचम की स्वर संगतियाँ बार बार प्रयुक्त होती हैं ।हैं। इसके निकट के रागो में [[राग शंकरा]] का नाम लिया जाता है ।है। गायन समय रात्रि का द्वितीय प्रहर है ।है।
== राग का संक्षिप्‍त परिचय ==
आरोह-सा रे,ग प नि सां
 
अवरोह-सां नि प ग रे,ग रे,नि (मन्द्र) प(मन्द्र) सा ।सा।
 
पकड़-नि प ग रे,रे ग प रे सा