"लेखाकरण" के अवतरणों में अंतर

17 बैट्स् नीकाले गए ,  5 वर्ष पहले
छो
विराम चिह्न की स्थिति सुधारी।
छो (बॉट से अल्पविराम (,) की स्थिति ठीक की।)
छो (विराम चिह्न की स्थिति सुधारी।)
*'''9. वस्तुओं की कीमत लगाना'''- यदि व्यापारी माल स्वयं तैयार कराता है और उन सब का हिसाब बहीखाते बनाकर रखता है तो उसे माल तैयार करने की लागत मालूम हो सकती है। लागत के आधार पर वह अपनी निर्मित वस्तुओं का विक्रय मूल्य निर्धारित कर सकता है।
 
*'''10. आर्थिक स्थिति का ज्ञान'''- बहीखाते रखकर व्यापारी हर समय यह मालूम कर सकता है कि उसकी व्यापारिक स्थिति संतोषजनक है अथवा नहीं ।नहीं।
 
==पुस्तपालन (बुककीपिंग) तथा लेखाकर्म (एकाण्टैंसी) में अन्तर==
| मुख्य उद्देश्य
| पुस्तपालन का मुख्य उद्देश्य दिन प्रतिदिन के लेनदेनों को क्रमबद्ध रूप से पुस्तकों में लिखना है।
| इसका मुख्य उद्देश्य पुस्तपालन से प्राप्त सूचनाओं से निष्कर्ष निकालना व उनका विश्लेषण करना है ।है।
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| ३
| क्षेत्र
| इसका क्षेत्र व्यापारिक लेनदेनों को लेखों की प्रारम्भिक पुस्तकों में लिखने व खाते बनाने तक सीमित रहता है।
| इसका क्षेत्र निरन्तर विस्तृत होता जा रहा है ।है। लेखा पुस्तकों से व्यापारिक निष्कर्ष निकालना, उनका विश्लेषण करना तथा प्रबन्ध को उपयोगी सूचनाएंदेना इसके क्षेत्र में सम्मिलित हैं।
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| कार्य की प्रकृति
| इसका कार्य एक प्रकार से लिपिक प्रकृति का होता है ।है।
| लेखाकर्म एक प्रकार से तकनीकी प्रकृति का कार्य है ।है।
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| ५
 
===नकद लेन-देन (रोकड़) प्रणाली===
इस प्रणाली का प्रयोग अधिकतर गैर व्यापारिक संस्थाओं जैसे क्लब, अनाथालय, पुस्तकालय तथा अन्य समाज सेवी संस्थाओं द्वारा किया जाता है। इन संस्थाओं का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं होता और ये पुस्तपालन से केवल यह जानना चाहती है कि उनके पास कितनी रोकड़ आयी तथा कितनी गयी और कितनी शेष है रोकड़ प्रणाली के अन्तर्गत केवल रोकड़ बही (कैश बुक) बनायी जाती है। इस पुस्तक में सारे नकद लेनदेनों को लिखा जाता है। वर्ष के अन्त में कोई अन्तिम खाता या लाभ-हानि खाता आदि नहीं बनाया जाता ।जाता। आय-व्यय की स्थिति को समझने के लिए एक आय-व्यय खाता (Income & Expenditure Account) बनाया जाता है।
 
===इकहरा लेखा प्रणाली===
 
===भारतीय बहीखाता प्रणाली===
यह भारत में अत्यन्त प्राचीनकाल से प्रचलित पद्धति है। अधिकांश भारतीय व्यापारी इस प्रणाली के अनुसार ही अपना हिसाब-किताब रखते हैं ।हैं। यह भी निश्चित सिद्धान्तों पर आधारित पूर्णतया वैज्ञानिक प्रणाली है ।है। इस प्रणाली के आधार पर भी वर्ष के अन्त में लाभ-हानि खाता तथा आर्थिक चिट्ठा बनाया जाता है ।है।
 
==लेखांकन की शाखायें==
===वित्तीय लेखांकन (Financial accounting)===
वित्तीय लेखांकन का मुख्य उद्देश्य वित्तीय सूचनाओं को पहचानना, मापना, लिखना, संवहन करना और साथ ही व्यापारिक सौदों को लेखा पुस्तकों में इस प्रकार से दर्ज करना जिससे कि एक निश्चित अवधि के लिए व्यवसाय के संचालनात्मक परिणाम ज्ञात किये जा सकें तथा एक निश्चित तिथि को आर्थिक स्थिति का पता लगाना है ।है।
 
===लागत लेखांकन (Cost accounting)===
 
===मुद्रा-स्फीति लेखांकन (Inflation Accounting)===
बीते हुए समय की दीर्घ अवधि की मूल्य स्थिति को देखा जाये तो एक बात सर्वमान्य स्पष्ट है कि विश्व में प्रत्येक वस्तु के मूल्यां में सामान्यतः वृद्धि हुई है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मूल्य सूचकांकों में परिवर्तन की गति बेहद तीव्र हुई। मुद्रा स्फीति की इस स्थिति ने व्यावसायिक जगत में आर्थिक परिणामों की तुलनीयता को निरर्थक बना दिया। मुद्रा स्फीति के इस दुष्परिणाम का प्रभाव शून्य पर वास्तविक परिणामों की जानकारी करने के लिए मुद्रा स्फीति मूल्य सूचकांकां की सहायता से लाभ-हानि खाते को समायोजित किया जाता है और इसी प्रकार से चिट्ठे में स्थायी सम्पत्तियों के मूल्यों को समायोजित किया जाता है। पुनर्मूल्यांकन द्वारा भी अन्तिम खातों को तैयार किया जाता हे। वर्तमान में इस लेखांकन की दो विधियां-वर्तमान लागत लेखांकन तथा वर्तमान क्रय शक्ति लेखांकन प्रचलन में है ।है।
 
===सामाजिक दायित्व लेखांकन (Social Responsibility Accounting)===
==खातों के प्रकार==
 
प्रत्येक लेनदेन में दो पहलू या पक्ष होते हैं ।हैं। खाता-बही (Ledger) में प्रत्येक पक्ष का एक खाता बनाया जाता है। खाता (Account) खाता बही (लेजर) का वह भाग है जिसमें व्यक्ति, वस्तुओं अथवा सेवाओं के सम्बन्ध में किए हुए लेनदेनों का सामूहिक विवरण लिखा जाता है। इस प्रकार प्रत्येक खाते की स्थिति का पता लग जाता है कि वह खाता लेनदार (Creditor) है तथा देनदार (Detor)।
दोहरी प्रणाली के अनुसार स्रोतों में लेनदेनों को लिखने के लिए खातों के वर्गीकरण को जानना आवश्यक है ।है।
 
; खातों के प्रकार
 
===व्यक्तिगत खाते===
जिन खातों का सम्बन्ध किसी विशेष व्यक्ति से होता है, वे व्यक्तिगत खाते कहलाते हैं। व्यक्ति का अर्थ स्वयं व्यक्ति, फर्म, कम्पनी और अन्य किसी प्रकार की व्यापारिक संस्था होता है। दूसरे शब्दों में, सब लेनदारों तथा देनदारों के खाते व्यक्तिगत खाते होते हैं। इस दृष्टि से पूंजी (capital) तथा आहरण (drawing) के खाते भी व्यक्तिगत होते हैं क्योंकि इनमें व्यापार के स्वामी से सम्बन्धित लेनदेन लिखे जाते हैं। व्यापार के स्वामी के व्यक्तिगत खाते को पूंजी खाता कहा जाता है। व्यापार के स्वामी द्वारा व्यवसाय से मुद्रा निकालने के लिए आहरण खाता खोला जाता है। इस प्रकार आहरण खाता भी व्यक्तिगत खाता होता है ।है।
 
===वास्तविक खाते===
वस्तुओं और सम्पत्ति के खाते वास्तविक खाते कहलाते हैं। इन खातों को वास्तविक इसलिए कहा जाता है कि इनमें वर्णित वस्तुएं, विशेष सम्पत्ति के रूप में व्यापार में प्रयोग की जाती है। आवश्यकता पड़ने पर इन्हें बेचकर व्यापारी अपनी पूंजी को धन के रूप में परिवर्तित कर सकता है। वास्तविक खाते आर्थिक चिट्ठे में सम्पत्ति की तरह दिखाये जाते हैं। जैसे मशीन, भवन, माल, यन्त्र, फर्नीचर, रोकड व बैंक आदि के वास्तविक खाते होते हैं ।हैं।
 
===नाममात्र के खाते===
इन खातों को अवास्तविक खाते भी कहते हैं। व्यापार में अनेक खर्च की मदें, आय की मदें तथा लाभ अथवा हानि की मदें होती हैं। इन सबके लिए अलग-अलग खाते बनते हैं जिनको ‘नाममात्र’ के खाते कहते हैं। व्यक्तिगत अथवा वास्तविक खातों की तरह इनका कोई मूर्त आधार नहीं होता। उदाहरण के लिए वेतन, मजदूरी, कमीशन, ब्याज इत्यादि के खाते नाममात्र के खाते होते हैं ।हैं।
 
==खाते के भाग==
प्रत्येक लेनदेन के दो पक्ष होते हैं। ऋणी या डेबिट पक्ष और धनी या क्रेडिट पक्ष। इस कारण उसका लेखा लिखने के लिए प्रत्येक खाते के दो भाग होते हैं। बायें हाथ की ओर भाग ‘ऋणी पक्ष’ ( डेबिट साइड) होता है और दाहिने हाथ की ओर का भाग ‘धनी पक्ष’ (क्रेडिट साइड) होता है ।है।
 
'''खातों को डेबिट या क्रेडिट करना''' - जब किसी लेन-देन में कोई खाता ‘लेन’ पक्ष होता है अर्थात् उसको लाभ प्राप्त होता है तब उस खातो को डेबिट किया जाता है। डेबिट करने का मतलब यह है कि खाते के ऋणी (डेबिट) भाग (बांये हाथ वाले भाग) में लेनदेन का लेखा होगा। इसी प्रकार जब कोई खाता लेनदेन में देन पक्ष होता है अर्थात् उसके द्वारा कुछ लाभ किसी को होता है, तब उस खाते को क्रेडिट किया जाता है। अर्थात् उस खाते के क्रेडिट भाग में लेनदेन का लेखा किया जाएगा। प्रत्येक लेनदेन में इस तरह एक खाता (डेबिट) तथा दूसरा खाता क्रेडिट किया जाता है। डेबिट (डेबिट) खाते में डेबिट की ओर लेखा तथा क्रेडिट खाते में क्रेडिट की ओर लेखा होता है। क्रेडिट तथा डेबिट लेखा दोहरे लेखे की प्रणाली के अनुसार प्रत्येक लेनदेन के लिए किया जाता है।