"ईजियाई सभ्यता" के अवतरणों में अंतर

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क्नोसस के राजप्रासाद का निर्माण नवप्रस्तरयुगीन भग्नावशेषों के ऊपर हुआ है। क्नोसस के प्रासादों के भग्नावशेष क्रीत के उत्तरी तट पर कांदिया के आधुनिक नगर के निकट ही हैं। वहाँ के पश्चिमी प्रवेशद्वार की विशालता और फाइस्तस के गैलरीनुमा रंगप्रांगण, जो पत्थर के बने हैं, वास्तुकला की प्रगति में उस प्राचीन काल में एक आदर्श प्रस्तुत करते हैं। क्नोसस के उत्तरी और फाइस्तस के दक्षिणी राजमहल प्राय: एक ही समय बने थे। क्रीत के दक्षिणी तट पर फाइस्तस के महलों के खंडहर हैं और उनके पास ही आगिया त्रियादा के राजप्रासाद के भग्नावशेष भी हैं, यद्यपि वे बने उत्तर-मिनोई-युग में थे।
 
लगता है, क्नोसस के महल युगों तक बनते और आवश्यकतानुसार बदलते चले आए थे। राजाओं की बढ़ती हुई समृद्धि, कला की प्रगति और सुरुचि के परिष्कार के अनुकूल समय समय पर उनमें परिवर्तन होते गए। इस प्रकार के परिवर्तन कुछ मध्ययुग में भी हुए थे, परंतु पिछले युग में तो इन महलों के रूप ही बदल डाले गए। जिस रूप में उनके खंडहर आज पुराविदों के प्रयत्नों से प्रस्तुत हुए हैं उनसे प्रगट है कि इन महलों में असाधारण बड़े बड़े हाल थे, घुमावदार सोपानमार्ग थे, ढलान पर उतरनेवाले लंबे कक्ष थे, और बाहरी प्रासाद से संलग्न भवन थे-और फिर दूर, क्रीती सभ्यता का नागरिक विस्तार पश्चिम के पर्वतों के ऊपर तक चला गया था। प्रधान राजप्रासाद अपनी उच्चस्तरीय जीवनसुविधाओं के साथ अत्यंत आधुनिक लगता है। उन सुविधाओं का एक प्रधान अंग उनकी गंदे जल की नालियाँ हैं। मिस्री फराऊनों और पेरिक्लीज़कालीन एथेंस के कोई मकान उसके जोड़ के न थे। हाँ, यदि प्रासादनिर्माण की शालीनता में इसका कोई पराभव कर सकता है तो वे निनेवे के असुरबनिपाल के सचित्र प्रासाद हैं। फिर भी दोनों में काफी अंतर है। जहाँ असुरबनिपाल के महल सूने हैं और ठंडे तथा जाड़ों के लिए असुविधाजनक लगते हैं वहाँ मिनोई राजप्रासाद गरम और आरामदेह हैं और उनकी चित्रित दीवारों से लगता है कि उनमें भरापूरा जीवन लहरें मारता था। उनके भित्तिचित्रों से प्रगट है कि क्नोसस के महलों के भीतर राजा का दरबार भरा रहता था, और उसमें नर और नारी परिचारकों की संख्या बड़ी थी। राजा और उसके दरबारी सभी प्रसन्न और जीवन को निर्बध भोगते हुए चित्रित हुए हैं। चित्रों की आकृतियाँ अनेक बार कठोर और निश्छंद रूढ़िगत सी हो गई हैं, कुछ भोंडी भी हैं, परंतु उनकी रेखाएँ बड़ी सबल हैं। उनके खाके निश्चय असाधारण कलावंतों ने खींचे होंगे। भित्तिचित्रों से प्रमाणित है कि दरबार के आमोदप्रमोदों में नारियाँ उसी स्वच्छंदता से भाग लेती थीं जैसे पुरुष। नर और नारी दोनों समान अधिकार से सामाजिक जीवन में भाग लेते थे, और प्रतीत तो ऐसा होता है कि राजमहल और समाज के जीवन में नारी का ही प्रभुत्व अधिक था। इसमें संदेह नहीं कि उस प्राचीन जगत्‌ में क्रीत की सभ्यता ने जितने अधिकार नारी को दिए, पुरुष का समवर्ती जो स्थान उसे दिया वह तब के जीवन में कहीं और संभव न था।
 
भित्तिचित्रों में नारी की त्वचा श्वेत और पुरुष की रक्तिम चित्रित हुई है, प्राय: मिस्री रीति के अनुसार। दरबारी दाढ़ी मूँछ मुड़ाकर चेहरे साफ रखते थे और केश लंबे, जिन्हें वे नारियों की ही भाँति वेणियों में सजा लेते थे। अनेक बार तो साँड़ों की लड़ाई देखते लड़कों में लड़कियों का पहचानना कठिन हो जाता है और यदि उनकी त्वचा रूढ़िगत रंगों से स्पष्ट न कर दी गई होती तो दोनों का दर्शन नितांत समान होता। नारियों में परदा न था, यह तो उस काल के चित्रित दृश्यों से अनुमित हो ही जाता है, वैसे भी खिड़कियों में बिना घूँघट के बैठी नारियों की आकृतियों से उनकी इस अनवगुंठित स्थिति का प्रकाश होता है। नारियाँ गर्दन और बाहुओं को निरावृत्त रखती थीं, हारों से ढक लेती थीं, वस्त्र कटि पर कस लेती थीं, और नीचे अपने घाघरे की चूनटें की चूनटें आकर्षक रूप से पैरों पर गिरा लेती थीं। पिछले युग के चित्रों में नारियाँ, कम से कम राजमहल की, मस्तक पर किरीट भी पहने हुए हैं। पुरुषों का वेश उनसे भिन्न था, अत्यंत साधारण। वे कटि से नीचे जाँघिया पहनते थे, अनेक बार मिस्री चित्रों के पुरुषों की घुटनों तक पहुँचानेवाली तहमत की तरह, किंतु रंगों के प्रयोग से चमत्कृत। मिस्री पुरुषों की भाँति उनके शरीर का ऊर्ध्वार्ध नंगा रहता था, और जब तब वे कोनदार टोपी पहनते थे। पुरुषों के केश वेणीबद्ध या खुले ही कमर तक लटकते थे या जब तब वे उनमें गाँठ लगा सिर के ऊपर बाँध लेते थे। क्नोसस के पुरुष भी पिछले युग के खत्तियों की भाँति पैरों में ऊँची सैंडिल या बूट पहनते थे। मिनोई सभ्यता की नरनारियों का रंगरूप प्राय: आज के इटलीवालों का सा था। उनके नेत्र और केश काले थे, नारियों का रंग संभवत: धूमिलश्वेत और पुरुषों का चटख ताम्र।
 
जीवन सुखी, आमोदमय और प्रसन्न था। लोग नर-पशु-युद्ध देखते और उनमें भाग लेते थे। परंतु उनके पास संभवत: रक्षा के साधन कम थे, कम से कम कवच खुदाइयों में नहीं मिला है। तलवार का उपयोग वे निश्चय करते थे।
आमोद के जीवन में स्वाभाविक ही धर्म की कठोर रूढ़ियाँ समाज को आतंकित नहीं कर पातीं और मिनोई समाज में भी उनका अभाव था। परंतु उनके देवता थे, यद्यपि उनको स्पष्टत: पहचान पाना कठिन है। फिर भी यह स्पष्टत: कहा जा सकता है कि लोगों का विश्वास वृक्षों, चट्टानों, नदियों आदि से संबंधित देवताओं में था और कम से कम एक विशिष्ट सर्पदेवी की मातृपूजा वे अवश्य करते थे। इस प्रकार की मातृदेवी की आकृतियाँ जो सर्प धारण करती हैं वहाँ चित्रित मिली हैं।
 
महलों के भित्तिचित्रों से तो प्रगट ही है कि चित्रकला विशेष रूप से कलावंतों द्वारा विकसित हुई थी, और उनमें रंगों का प्राधान्य एक तकनीक का आभास भी देता है। पत्थर को कोरकर मूर्ति बनाने अथवा उसकी पृष्ठभूमि से उभारकर दृश्य लिखने की कला ने नि:संदेह एशियाई देशों के अनुपात में प्रश्रय नहीं पाया था, और उनकी उपलब्धि अत्यंत न्यून संख्या में हुई है। आगिया त्रियादा से मिले कुछ उत्कीर्ण दृश्य निश्चय ऐसे हैं जिनकी प्रशंसा किए बिना आज का कलापारखी भी न रह सकेगा।
 
== अंतिम युग ==
[[होमर]] ने अपने [[ईलियद]] में जिस त्राय के युद्ध की कथा अमर कर दी है वह [[त्राय]] उसी मिनोई ईजियाई सभ्यता का एक उपनिवेश था, राजा प्रियम्‌ की राजधानी, जिसके राजकुमार पेरिस ने ईजियाई सभ्यता को नष्ट करनेवाले एकियाई वीरों में प्रधान अगामेम्नन के भाई मेनेलाउ की भार्या हेलेन को हर लिया था। होमर की उस कथा का लघुएशिया के उस ईजियाई उपनिवेश त्राय की नगरी के विध्वंस से सीधा संबंध है और उसकी ओर संकेत कर देना यहाँ अनुचित न होगा। उस त्राय नगरी को श्लीमान ने खोद निकाला है, एक के ऊपर एक बसी त्राय की छह नगरियों के भग्नावशेषों को, जिनमें से कम से कम सबसे निचली दो होमर की कथा की त्राय नगरी से पूर्व के हैं।
 
महाकवि होमर स्वयं संभवत: ई.पू. 9वीं सदी में हुआ था। उसके समय में अनंत एकियाई वीरगाथाएँ जातियों और जनों में प्रचलित थीं जिनको एकत्र कर एकरूपीय श्रृंखला में अपने मधुर गेय भावस्रोत के सहारे होमर ने बाँधा। ये गाथाएँ कम से कम तीन चार सौ वर्ष पुरानी तो उसके समय तक हो ही चुकी थीं। इन्हीं गाथाओं में संभवत: एकियाई जातियों का ग्रीस के ईजियाई उपनिवशों और स्वयं क्रीत के नगरों पर आक्रमण वर्णित था जिसका लाभ होमर को हुआ। कुछ आश्चर्य नहीं जो एकियाई जातियों ने ही ईजियाई सभ्यता का विनाश किया हो। परंतु एकियाई जातियों के बाद भी लगातार उत्तर से आनेवाली आर्य ग्रीक जातियों के आक्रमण ग्रीस पर होते रहे। उन जातियों मे विशिष्ट दोरियाई जाति थी जिसने संभवत: 12वीं सदी ई.पू. में समूचे ग्रीस को लौहायुधों द्वारा जीत लिया और सभ्यता की उस प्राचीन भूमि पर, प्राचीन नगरों के भग्नावशेषों के आसपास, और उसी प्रकार क्वाँरी भूमि पर भी, उनके नगर बसे जो प्राचीन ग्रीस के नगरराज्यों के रूप में प्रसिद्ध हुए और जिन्होंने पेरिक्लीज़ और सुकरात के संसार का निर्माण किया।
 
== सन्दर्भ ग्रंथ ==