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[[भारत]] में अति प्राचीन काल से ही दीवारों से ईटें (या पत्थर) निकाल प्रत्येक रद्दा आगे बढ़ाते हुए छत पाटने का चलन था, किंतु वे रद्दे समतल ही होते थे। फलत: शिखर अनिवार्यत: ऊँचे हो जाते थे। वास्तविक डाट का सिद्धांत संभवत अज्ञात ही था। तोरण (जो वास्तविक डाट के सिद्धांत पर बने) तथा गुंबद मध्यपूर्व की देन हैं। अब तक सीधे नीचे की ओर भार डालनेवाले पट रद्दों की सूखी चिनाई पर आधारित भारतीय निर्माणशैली में एक मोड़ आया और मुस्लिम काल की प्रसिद्ध इमारतों में गुंबदों को विशिष्ट स्थान मिला। बीजापुर में मुहम्मद अलीशाह के मकबरे के ऊपर संसार का विशालतम गुंबद (भीतरी चौड़ाई 135’ ऊँचाई 178’) खडा है। ईटों के पट रद्दे मोटे मसाले में जमाकर निर्मित लगभग 10’ मोटाई का यह गुंबद भारतीय वास्तुकौशल का विजयस्तंभ ही है।
 
धीरे-धीरे मस्जिदों और मकबरों के रूप में गुंबद देश भर में फैले और उत्तर भारत में तो मंदिरों में भी अनिवार्यत: प्रयुक्त होने लगे। मुगलकालीन कृतियों में आगरे के ताजमहल का उल्लेख ही पर्याप्त होगा, जिसके प्रति विश्व भर के दर्शक आकर्षित होते हैं। अंग्रेजों के समय में भी अनेक ऐतिहासिक भवनों में गुंबद का उपयोग हुआ, और अब भी मंदिरों के अतिरिक्त, अन्य अनेक भवनों का शीर्षस्थान इन्हीं के लिए सुरक्षित रखा जाता है।
 
पश्चिमी देशों में भी गुंबदों का उपयोग अनेक प्रमुख गिरजाघरों की छतों में हुआ है। इन पर कभी कभी परंपरागत शिखर का रूप देने के लिए लकड़ी का बाहरी आवरण भी लगाया जाता रहा है।