"तोप" के अवतरणों में अंतर

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== तोपों का निर्माण ==
तोपों, हाउविट्ज़रों और मॉर्टरों की [[आकल्पना]]ओं ([[डिजाइन|डिज़ाइनों]]) में अंतर रहता है। मुख्य अंतर संछिद्र के व्यास और इस व्यास तथा लंबाई के अनुपात में रहता है। यंत्र में जितनी ही अधिक बारूद भरनी हो, यंत्र की दीवारों को उतना ही अधिक पुष्ट बनाना पड़ता है। इसीलिए तोप उसी नाप के संछिद्रवाले हाउविट्ज़र से भारी होती है। अब तो उच्च आतति (हाइ टेंसाइल) इस्पातों के उपलब्ध रहने के कारण पुष्ट तोपों का बनाना पहले जैसा कठिन नहीं है, परंतु अब बारूद की शक्ति भी बढ़ गई है। अब भी तोपों की नालें ठंड़ी नालों पर तप्त ओर कसे खोल चढ़ाकर बनाई जाती हैं, या उनपर इस्पात का तप्त तार कसकर लपेटा जाता है और इस तार के ऊपर एक बाहरी नाल तप्त करके चढ़ा दी जाती है। भीतरी नाल अति तप्त इस्पात में गुल्ली (अवश्य ही बहुत बड़ी गुल्ली) ठोंककर बनाई जाती है और नाल को ठोंक पीटकर उचित आकृति का किया जाता है। इसके बदले वेग से घूर्णन करते हुए साँचे में भी कुछ नालें ढाली जाती हैं। इनमें द्रव इस्पात छटकर बड़े वेग से साँचे की दीवारों पर पड़ता है। यह विधि केवल छोटी तोपों के लिए प्रयुक्त होती है। नाल के बनने के बाद उसे बड़े सावधानीपूर्वक तप्त और ठंडा किया जाता है, जिसमें उसपर पानी चढ़ जाय (अर्थात् वह कड़ी हो जाय), और फिर उसका पानी थोड़ा उतार दिया जाता है (कड़ापन कुछ कम कर दिया जाता है), जिसमें ठोकर खाने से उसके टूटने का डर न रहे। तप्त और ठंडा करने के काम में बहुधा दो सप्ताह तक समय लग सकता है, क्योंकि आधुनिक नाल 60 फुट तक लंबी और 60 टन तक भारी होती है। सब काम का पूरा ब्योरा लिखा जाता हे, जिसमें भविष्य में अनुभव से लाभ उठाया जाय। लोहे से टुकड़े काट काटकर उसकी जाँच बार-बार होती रहती है। अंत में नाल को मशीन पर चढ़ाकर खरादते हैं। फिर संछिद्र में लंबे सर्पिल काटे जाते हैं। इस क्रिया को "राइफलिंग" कहते हैं, बड़ी तोप की राइफलिंग में दो तीन सप्ताह लग जाते हैं।
 
=== पश्चखंड ===