"दिक्सूचक": अवतरणों में अंतर

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यह चुंबकीय दिक्सूचक साधारण यंत्र की अपेक्षा अधिक जटिल एवं यथार्थ होता है। इस यंत्र के पाँच मुख्य भाग होते हैं : पत्रक, चुंबकीय सुइयाँ, रत्नित टोपी (jewelled cap), कीलक (द्रत्ध्दृद्य) तथा कटोरा। पत्रक के केंद्र पर रत्नित टोपी संलग्न रहती है तथा पत्रक के नीचे विभिन्न चुंबकीय सुइयाँ संलग्न रहती है। पत्रक और सुइयों की यह संपूर्ण व्यवस्था, कटोरे के अंदर एक केंद्रीय कीलक पर आरोपि इस प्रकार संतुलित रहती है कि चाहे पोत की स्थिति में कितना भी परिवर्तन हो जाए, दिक्सूचक पत्रक सदैव क्षैतिज अवस्था में रहता है।
 
दिक्सूचक पत्रक कागज अथवा अभ्रक की एक क्षैतिज वृत्ताकार चकती होती है। यह पत्रक, स्पष्ट रूप से प्रधान दिग्बिंदुओं (cardinal points), उत्तर, पूर्व, दक्षिण और पश्चिम, में चिन्हित रहता है। इन विंदुओं के मध्य में अंत: प्रधान दिग्विंदु उत्तर पूर्व, उत्तर पश्चिम, दक्षिण पूर्व और दक्षिण पश्चिम, अंकित होते हैं। इनके मध्य में भी अर्धबिंदु और चतुर्थ बिंदु अंकित होते हैं। इस प्रकार पुराने दिक्सूचक पत्रक के किनारे पर दिशा में ३२ बिंदु अंकित होते हैं, और उनके बीच का अंतर के तुल्य होता है।
 
आधुनिक दिक्सूचक पत्रक पर, उत्तर से आरंभ करके, दक्षिणावर्त दिशा में ०रू से लेकर ३६०रू तक के चिन्ह अंकित होते हैं।