"अण्डमानी लोग" के अवतरणों में अंतर

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पहले बर्मा भी भारत का एक अंग था। भारत के वाइसराय के अधीन एक उपराज्यपाल बर्मा प्रान्त का शासन देखता था। जिन लोगों को आजीवन कारावास का दण्ड दिया जाता था, उन्हें भी बर्मा से इन द्वीपों में भेज दिया जाता था। शुरू में आजीवन कारावास में भेजे जाने वालों की संख्या कम थी। परन्तु थारवर्दी विद्रोह के बाद ५३५ लोग एक साथ आजीवन कारावास के लिए अण्डेमान भेजे गए और उसी दिन चौबीस फरवरी, उन्नीस सौ पैंतीस को थारवर्दी विद्रोहियों को मृत्यु दण्ड दे दिया गया। सन् १९४२ ई। में जब द्वीपों पर जापानियों ने कब्जा किया तो लगभग पांच हजार बर्मी थे। १९२८ में बर्मी संघ ने डा। सायासेन को अपना महासचिव चुना। डा। सेन ने किसानों की मदद से एक विद्रोही सेना का गठन कर लिया। उन्होंने थारवर्दी के घने वनों में बन्दूकें और गोला बारूद का भण्डार बना लिया। दिसम्बर १९३० ई। में सारे बर्मा के युवकों ने डा। सेन के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह की घोषणा कर दी। डा। सेन ने एक घोषणा पत्र द्वारा किसानों पर लगे सारे ऋण माफ कर दिए। बौद्ध धर्म को राज्य का धर्म घोषित कर दिया गया। थारवर्दी क्षेत्र में जेलों के फाटक तोड़ कर बन्दियों को मुक्त कर दिया गया। पुलिस कर्मचारियों और ग्रामों के मुखियाओं से हथियार छीन लिए गए। पुल, रेल की लाइनें, टेलीग्राफ और टेलीफोन के तार काट दिये गए।
 
सात दिन के लिए डा.डॉ॰ सेन के स्वयं-सेवक, थारवर्दी प्रदेश में अंग्रेज कलेक्टर के आत्मसमर्पण के बाद, सत्ता को सम्भाले रहे। सात दिन के बाद अंग्रेजी फौज आ गई और तीन दिन युद्ध के बाद विद्रोह कुचल दिया गया। डा। सेन स्वयं बर्मा के अन्य क्षेत्रों में पहुंच गए और उनके अनुयायियों ने थानों और जेलों पर कब्जा कर लिया। अग्रेज सरकार ने पूरी शक्ति से दमन कार्य प्रारम्भ किया और गांव के गांव तोपों से भस्मीभूत कर दिए गए। ग्रामवासियों पर हर तरह के जुल्म ढाए गए। इस बर्माव्यापी विद्रोह को शान्त करने में चार वर्ष का समय लगा और उसके चार वर्ष बाद एक मित्र द्वारा विश्वासघात किए जाने पर डा। सायासेन को माण्डले वन में बीमारी की हालत में गिरफ्तार किया जा सका।
 
जो बर्मी क्रान्तिकारी अण्डेमान भेगे गए, वे कारावास की अवधि समाप्त करने के बाद, पोर्टब्लेयर में फोनिक्सेबे के क्षेत्र, सिप्पी घाट, हर्म्फीगंज और बर्मा नाला के आसपास बस गए। पोर्टब्लेयर के लाइट हाऊस सिनेमा के समीप स्थित बौद्ध मन्दिर आज भी अण्डमान के बर्मी लोगों की याद ताजा किए है। वर्ष सन् १९५१ ई। में कुल ३१ हजार जनसंख्या में से १,६०४ बौद्ध लोग थे। सन् १९६१ ई। की जनगणना में कुल ६३,५४८ व्यक्तियों में से १,७०७ बौद्ध धर्मावलम्बी थे परन्तु इसके बाद बर्मी लोग बर्मा लौट गए जिसके परिणामस्वरूप सन् १९७१ ई। की जनगणना में कुल ११५१३३ लोगों में बौद्ध धर्म मानने वालों की संख्या केवल १०३ रह गई थी।