"एरावतेश्वर मंदिर" के अवतरणों में अंतर

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== पौराणिक कथा ==
ऐरावतेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है. [[शिव]] को यहां ऐरावतेश्वर के रूप में जाना जाता है क्योंकि इस मंदिर में देवताओं के राजा [[इन्द्र|इंद्र]] के सफेद हाथी एरावत द्वारा भगवान शिव की पूजा की गई थी.थी। ऐसा माना जाता है कि ऐरावत ऋषी दुर्वासा के श्राप के कारण अपना रंग बदल जाने से बहुत दुखी था, उसने इस मंदिर के पवित्र जल में स्नान करके अपना रंग पुनः प्राप्त किया.किया। मंदिर के भीतरी कक्ष में बनी एक छवि जिसमें ऐरावत पर इंद्र बैठे हैं, के कारण इस धारणा को माना जाता है.<ref> देखें पी.वी. जगदीस अय्यर, पीपी 350-351</ref> इस घटना से ही मंदिर और यहां आसीन इष्टदेव का नाम पड़ा.
 
कहा जाता है कि मृत्यु के राजा यम ने भी यहाँ शिव की पूजा की थी.थी। परंपरा के अनुसार यम, जो किसी ऋषि के शाप के कारण पूरे शरीर की जलन से पीड़ित थे, ऐरावतेश्वर भगवान द्वारा ठीक कर दिए गए. यम ने पवित्र तालाब में स्नान किया और अपनी जलन से छुटकारा पाया. तब से उस तालाब को ''यमतीर्थम '' के नाम से जाना जाता है.
 
== वास्तुकला ==
''विमाना'' (स्तंभ) 24 मीटर (80फीट) उंचा है.<ref name="unesco"/> सामने के ''मण्डपम'' का दक्षिणी भाग पत्थर के बड़े पहियों वाले एक विशाल रथ के रूप में है जिसे घोड़ें द्वारा खींचा जा रहा है.<ref> देखें चैतन्य, के, पी 42</ref>
 
भीतरी आंगन के पूर्व में बेहतरीन नक्काशीदार इमारतों का एक समूह स्थित है जिनमें से एक को ''बलिपीट'' (बलि देने का स्थान) कहा जाता है. ''बलीपीट'' की कुरसी पर एक छोटा मंदिर बना है जिसमें [[गणेश]] जी की छवि अंकित है. चौकी के दक्षिणी तरफ शानदार नक्काशी से युक्त 3 सीढ़ियों का एक समूह है. चरणों पर प्रहार करने से विभिन्न संगीत ध्वनियां उत्पन्न होती हैं.हैं।<ref name="ayyar351"> देखें पी.वी. जगदीस अय्यर, पी 351</ref>
 
आंगन के दक्षिण-पश्चिमी कोने में 4 तीर्थ वाला एक ''मंडपम '' है. इनमें से एक पर यम की छवि बनी है. इस मंदिर के आसपास एक विशाल पत्थर की शिला है जिस पर ''सप्तमाताओं'' (सात आकाशीय देवियां) की आकृतियां बनी हैं.हैं।<ref name="ayyar351"/>
 
== देवी-देवता ==
 
== मंदिर में शिलालेख ==
इस मंदिर में विभिन्न शिलालेख हैं.हैं। इन लेखों में से एक में कुलोतुंगा चोल तृतीय द्वारा मंदिरों का नवीकरण कराए जाने का पता चलता है.<ref name="ayyar353"> देखें पी.वी. जगदीस अय्यर, पी 353</ref>
 
''बरामदे'' की उत्तरी दीवार पर शिलालेखों के 108 खंड हैं, इनमें से प्रत्येक में ''शिवाचार्या '' (शिव को मानने वाले संत) के नाम, वर्णन व छवियां बनी है जो उनके जीवन की मुख्य घटनाओं को दर्शाती हैं.हैं।<ref name="ayyar353"/><ref> देखें चैतन्य, के, पी 40</ref><ref> देखें गीता वासुदेवन, पी 55</ref>
 
''गोपुरा '' के पास एक अन्य शिलालेख से पता चलता है कि एक आकृति कल्याणी से लायी गई थी, जिसे बाद में राजाधिराज चोल प्रथम द्वारा कल्याणपुरा नाम दिया गया, पश्चिमि चालुक्य राजा सोमेश्वर प्रथम से उसकी हार के बाद उनके पुत्र विक्रमादित्य षष्ठम (VI) और सोमेश्नर द्वितीय ने चालुक्यों की राजधानी पर कब्जा कर लिया.<ref name="ayyar353"/><ref> देखें रिचर्ड डेविस, पी 51</ref>
== यूनेस्को वैश्विक धरोहर स्थल ==
[[चित्र:Darasuram temple front view.jpg|thumb|एरावतेश्वर मंदिर का दृश्य]]
इस मंदिर को वर्ष 2004 में [[महान चोला मंदिर|महान चोल जीवंत मंदिरों]] की सूची में शामिल किया गया. महान चोल जीवंत मंदिरों की सूची में [[तंजावुर]] का बृहदीश्वर मंदिर, गांगेयकोंडा चोलापुरम का गांगेयकोंडाचोलीश्वरम मंदिर और दारासुरम का ऐरावतेश्वर मंदिर शामिल हैं.हैं। इन सभी मंदिरों को 10 वीं और 12 वीं सदी के बीच चोलों द्वारा बनाया गया था और इनमे बहुत सी समानताएं हैं.हैं।<ref> देखें पी.वी. जगदीस अय्यर, पी 351</ref>
 
== टिप्पणियां ==