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विभिन्न फसलों को किसी निश्चित क्षेत्र पर, एक निश्चित क्रम से, किसी निश्चित समय में बोने को '''सस्य आवर्तन''' ('''सस्यचक्र''' या '''फ़सल चक्र''' (क्रॉप रोटेशन)) कहते हैं। इसका उद्देश्य पौधों के भोज्य तत्वों का सदुपयोग तथा भूमि की भौतिक, रासायनिक तथा जैविक दशाओं में संतुलन स्थापित करना है।
 
== परिचय ==
सभ्यता के प्रारम्भ से ही किसी खेत में एक निश्चित फसल न उगाकर फसलों को अदल-बदल कर उगाने की परम्परा चली आ रही है। फसल उत्पादन की इसी परंपरा को फसल चक्र कहते हैं अर्थात् किसी निश्चित क्षेत्र पर निश्चित अवधि के लिए भूमि की उर्वरता को बनाये रखने के उद्देश्य से फसलों को अदल-बदल कर उगाने की क्रिया को फसल चक्र कहते हैं। अथवा, किसी निश्चित क्षेत्रा में एक नियत अवधि में फसलों को इस क्रम में उगाया जाना कि उर्वरा शक्ति का कम से कम हृस हो फसल चक्र कहलाता है।
 
आदिकाल से ही मानव अपने भरण पोषण हेतु अनेक प्रकार की फसले उगाता चला आ रहा है। फसलें मौसम के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है। अधिक मूल्यवान फसलों के साथ चुने गये फसल चक्रों में मुख्य दलहनी फसलें, [[चना]], [[मटर]], [[मसूर]], [[अरहर]], [[उर्द]], [[मूँग]], [[लोबिया]], [[राजमा]], आदि का समावेश जरूरी है।
 
== एक ही फसल या एक ही तरह की फसल उगाने से हानि ==
किसी खेत में लगातार एक ही फसल उगाने के कारण कम उपज प्राप्त होती है तथा भूमि की उर्वरता खराब होती है। [[भारत]] के अनेक भागों में प्रचलित सबसे लोकप्रिय फसल उत्पादक प्रणाली '''धान-गेहूँ''', मृदा-उर्वरता के टिकाऊपन के खतरे का स्पष्ट आभास कराती प्रतीत हो रही है। इसके कारण उपजाऊ भूमि का क्षरण, जीवांश की माता में कमी, भूमि से लाभदायक सूक्ष्म जीवों की कमी, मित्र जीवों की संख्या में कमी, हानिकारक कीट पतंगों का बढ़ाव, खरपतवार की समस्या में बढ़ोत्तरी, जलधारण क्षमता में कमी, भूमि के भौतिक, रासायनिक गुणों में परिवर्तन, क्षारीयता में बढ़ोत्तरी, भूमिगत जल का प्रदूषण, कीटनाशीयों का अधिक प्रयोग तथा नाशीजीवों में उनके प्रति प्रतिरोधक क्षमता का विकास आदि हानियाँ होतीं हैं।
 
*15. '''अधिक उपज'''- उपर्युक्त कारणों से फसल की उपज प्राय: अधिक हो जाती है।
 
== फसल चक्र निर्धारण के मूल सिद्धान्त ==
फसल चक्र के निर्धारण में कुछ मूलभूत सिद्धान्तों को ध्यान में रखना जरूरी होता है जैसे-
*अधिक खाद चाहने वाली फसलों के बाद कम खाद चाहने वाली फसलों का उत्पादन,
*फसल का समावेश जलवायु तथा किसान की आर्थिक क्षमता के अनुरूप करना चाहिए।
 
== कुछ उपयोगी फसल चक्र ==
उत्तर प्रदेश में कुछ प्रचलित फसल चक्र इस प्रकार हैं जैसे -
 
*'''सब्जी आधारित फसल चक्र''' : भिण्डी-मटर, पालक-टमाटर, फूलगोभी-मूली, बन्दगोभी-मूली, बैंगन-लौकी, टिण्डा-आलू-मूली, घुईयां-शलजम-भिण्डी-गाजर, धान-आलू-टमाटर, धान-लहसुन-मिर्च, धान-आलू-लौकी इत्यादि हैं।
 
== बाहरी कड़ियाँ==
*[http://www.arganikbhagyoday.blogspot.in/2012/10/blog-post_8181.html फसल चक्र के सिद्धान्त]
*[http://www.healthinhindi.blogspot.in/2012/05/blog-post_9020.html फसल चक्र]