"लोक संगीत" के अवतरणों में अंतर

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लोकगीत तो प्रकृति के उद्गार हैं। साहित्य की छंदबद्धता एवं अलंकारों से मुक्त रहकर ये मानवीय संवेदनाओं के संवाहक के रूप में माधुर्य प्रवाहित कर हमें तन्मयता के लोक में पहुंचा देते हैं। लोकगीतों के विषय सामान्य मानव की सहज संवेदना से जुडे हुए हैं। जिसमें प्राकृतिक सौंदर्य सुख दुख और विभिन्न संस्कारों और जन्म मृत्यु को बड़े ही हृदयस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
 
संगीतमयी प्रकृति जब गुनगुना उठती है लोकगीतों का स्फुरण हो उठना स्वाभाविक ही है। विभिन्न ॠतुओं के सहजतम प्रभाव से अनुप्राणित ये लोकगीत प्रकृति रस में लीन हो उठते हैं। पावसी संवेदनाओं ने तो इन गीतों में जादुई प्रभाव भर दिया है पावस ॠतु में गाए जाने वाले बारह मासा, छैमासा तथा चौमासा गीत इस सत्यता को रेखांकित करने वाले सिद्ध होते हैं। यही नहीं लोकगीतों के स्वर्ण सभी मौसमों की संवेदनाओं के रस से छलकते हुए प्रतीत होते हैं।
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