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इन भूमि सुधार अधिनियमों के बनने पर भी जमींदारी प्रथा की बुराइयाँ विद्यमान रहीं, यद्यपि काफी हद तक जमींदारों को पंगु बना दिया गया था। इन जमींदारों को नेह डिग्री जी ‘ब्रिटिश सरकार की अतिलालित संतान (Spoilt child)’ कहा करते थे। वे भूतकालीन सामंतवादी प्रथा के प्रतीक थे जो कि आधुनिक परिस्थतियों के बिल्कुल प्रतिकूल हो गई थी। इसलिए इंडियन नेशनल कांग्रेस ने कई बार इस बात की घोषणा की कि जमींदारी उन्मूलन को कांग्रेस के कार्यक्रम में प्रमुख स्थान देना चाहिए। एक किसान कांफ्रेंस तारीख 27,28 अप्रैल सन् 1935 ई0 को सरदार पटेल के सभापतित्व में इलाहाबाद में हुई थी। उसने जमींदारी उन्मूलन को प्रस्ताव पास करके इस ओर एक प्रमुख कदम उठाया इस प्रस्ताव में यह घोषणा की गई थी कि ‘ग्रामकल्याण के दृष्टिकोण से वर्तमान जमींदारी प्रथा बिल्कुल विपरीत है। यह प्रथा ब्रिटिश शासन के आगमन में लाई गई और इससे ग्रामीण जीवन पूर्णतया तहस नहस हो गया है’। परंतु सन् 1939 ई0 में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो जाने के कारण भूमि सुधार का सारा कार्यक्रम रूक गया।
 
युद्ध की समाप्ति के बाद जमींदारी प्रथा के अंत का अंतिम चरण आरंभ हुआ जो सन् 1945 से 1955 तक चला। युद्ध समाप्त होते ही ब्रिटिश सरकार ने 1945 ई0 में [[गवर्नमेंट आफ इंडिया ऐक्ट]] 1935 ई0 के अंतर्गत प्रांतीय सदनों के चुनाव करने का फैसला किया। कांग्रेस ने चुनाव में भाग लेने का निश्चय किया और दिसंबर 1945 में चुनाव घोषणापत्र निकाला। इस घोषणापत्र में जमींदारी उन्मूलन के विषय में स्पष्टतया कहा गया कि ‘भूमि व्यवस्था का सुधार, जिसकी भारत में अति आवश्यकता है, कृषकों तथा राज्यके बीच मध्यवर्ती वर्ग को हटाने से संबंधित है। इसलिए इस मध्यवर्ती वर्ग के अधिकारों का उचित प्रतिकर देकर प्राप्त कर लिया जाना चाहिए’। इस घोषणा पत्र से अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ तथा पत्रकार सभी सहमत थे। जमींदारी प्रथा भारतीय आर्थिक विकास में रूकावट डालती थी क्योंकि बड़े जमींदार हमेशा प्रतिक्रियावाद के समर्थक थे। ‘लंदन इकोनोमिस्ट’ ने इनके विषय में लिखा था कि ‘इनमें से अधिकतर ‘थैकरसे’ के पात्र ‘लार्ड स्टीन’ की तरह दुश्चरित्र, ‘जेन आस्टीन’ के ‘मिस्टर बेनेट’ की तरह आलसी, ‘सुर्तीजस्क्वायर’ की तरह शराबी थे (Indian land porblem, G.D. Patel )। बंगाल लैंड कमीशन (सन् 1940 ई0) भी इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि ‘सन् 1793 ई0 का स्थायी बंदोबस्त उस समय जिन भी कारणों से उचित समझा गया हो, आज की परिस्थिति में अनुपयुक्त है और जमींदारी प्रथा में इतनी बुराइयाँ उपज चुकी है कि यह अब राष्ट्र के हित में किसी भी प्रकार उपयोगी नहीं रह गई है।’ भारतीय तथा पाश्चात्य अर्थवेत्ताओं की राय में जमींदारी उन्मूलन अधिक कृषि उत्पादन के लिए अत्यावश्यक है। इसके अतिरिक्त यह प्रथा संसार के हर भाग में समयानुकूल न होने के कारण समाप्त हो चुकी है। पुनश्च, यह प्रथा राज्य के लिये अधिक खर्चीली है। सर्वोपरि, यह प्रथा इस समय ऐसी स्थिति पर पहुँच चुकी थी कि यदि इसका उन्मूलन न किया गया होता तो इसके कारण ने केवल राष्ट्रीय आर्थिक समस्या पर ही वरन् समाज सुरक्षा पर भी विपत्ति आ पड़ती।
 
=== समाप्ति ===