"मान्य औषधकोश" के अवतरणों में अंतर

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इंग्लैंड में 1617 ई में साधारण प्रयोग में आनेवाली औषधियों को औषधिविक्रेता और पंसारी बेचा करते थे। बाद में बेचनेवालों पर राजकीय प्रशासन द्वारा नियंत्रण होने लगा। 1618 ई में वहाँ कालेज ऑव फिजिशियन्स ऐंड सर्जन्स द्वारा पहले भेषज संग्रह का प्रकाशन हुआ था। 1618 ई0 से 1851 ई0 तक लंदन फारमाकोपिया के 13 संस्करण निकले थे। 1999 ई0 में एडिनबरा औषधकोश का प्रथम संस्करण छपा तथा 1807 ई0 में डबलिन औषधकोश छपा। इन तीनों औषधकोशों की औषधियों में पृथकता होने के कारण 1858 ई0 के मेडिकल कानून द्वारा जेनेरल औषध परिषद् ने ब्रिटिश फारमाकोपिया तैयार कराया, जो 1864 ई0 में पहले पहल प्रकाशित हुआ और तब से समय समय पर नए नए आविष्कारों को लेकर पुस्तक के संशोधन द्वारा नए संस्करण निकलते रहे हैं। अब प्राय: सभी देशों के अपने अपने ओषधकोश बन गए हैं। अंतरराष्ट्रीय औषधकोश अभी तक नहीं बन पाया है।
 
भारतीय शासन द्वारा स्थापित नैशनल फार्मूलरी कमिटी ने नैशनल फार्मूलरी ऑव इंडिया नामक एक ग्रंथ अंग्रेजी में तैयार किया, जिसमें लगभग सब ओषधि द्रव्यों का वर्णन और उनसे बनने वाले नुस्खे दिए हैं। यह 1960 ई0 में स्वास्थ्य मंत्रालय, केंद्रीय सरकार, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित हो गया। ब्रिटिश फारमाकोपिया के आधार पर हिंदी में पश्चात्य द्रव्य-गुण-विज्ञान पर एक पुस्तक डा0डॉ॰ रामसुशील सिंह द्वार लिखी गई और मोतीलाल बनारसीदास वाराणसी द्वारा प्रकाशित हुई है।
 
== इन्हें भी देखें ==