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[[चीन]] के विद्वान् भी पुराने समय में, जैसा ईसा से 2,000 वर्ष पूर्व के लेख शू-किंग से पता चलता है, पाँच तत्व मानते थे। समस्त भौतिक सृष्टि के मूलाधार तत्व थे: '''पृथ्वी, अग्नि, जल धातु और काष्ठ'''। इन विद्वानों ने तत्व शब्द की कभी स्पष्ट परिभाषा देने की चेष्टा नहीं की। [[अरस्तू]] ने तत्वों के साथ भौतिक गुणों के संबंध का निर्देश किया। ये गुण थे: शुष्क या आर्द्र, उष्ण या शीतल और गुरु (भारी) या अल्प गुरु (हलका)।
 
यूरोप में 16वीं शती में रसायन के क्षेत्र का विस्तार हुआ, मामूली धातुओं को स्वर्ण में परिणत करना और आयु बढ़ाने एवं शरीर को निरोग करने के लिये ओषधियों की खोज करना रसायन का लक्ष्य बना। [[पैरासेल्सस]] ने तीन या चार तत्व माने, जिसके मूलाधार लवण, गंधक और पारद माने गए। ये तीनों क्रमश: स्थिरता, दहन या ज्वलन, एवं द्रवत्व या वाष्पशीलता के गुणों से संबंध रखते थे। 17वीं शती में फ्रांस एवं इंग्लैड में भी इसी प्रकार के विचारों के प्रश्रय मिलता रहा। डा0डॉ॰ विलिस (1621-1675 ई0) ने मूलाधार सक्रिय तत्व ये माने : पारा या स्पिरिट, गंधक या तेल और लवण तथा इनके साथ निष्क्रिय तत्व जल या कफ और मिट्टी भी माने। जे0 बी0 वान हेलमॉण्ट (1577-1644 ई0) ने [[पानी]] को ही मुख्य तत्व माना और ये लवण, गंधक और पारे को भी मूलत: पानी समझते थे। हवा को भी उन्होने तत्व माना।
 
तत्व के संबंध में सबसे अधिक स्पष्ट विचार [[रॉबर्ट बॉयल]] (1627-1691 ई0) ने 1661 ई0 में रखा। उसने तत्व की परिभाषा यह दी कि हम तत्व उन्हें कहेंगें, जो किसी यांत्रिक या [[रासायनिक क्रिया]] से अपने से भिन्न दो पदार्थों में विभाजित न किए जा सकें।