"राम प्रसाद 'बिस्मिल'": अवतरणों में अंतर

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[[भारतवर्ष]] को [[ब्रिटिश साम्राज्य]] से मुक्त कराने में यूँ तो असंख्य वीरों ने अपना अमूल्य बलिदान दिया परन्तु राम प्रसाद बिस्मिल एक ऐसे अद्भुत क्रान्तिकारी थे जिन्होंने अत्यन्त निर्धन परिवार में जन्म लेकर साधारण शिक्षा के बावजूद असाधारण प्रतिभा और अखण्ड पुरुषार्थ के बल पर ''हिन्दुस्तान प्रजातन्त्र संघ'' के नाम से देशव्यापी संगठन खड़ा किया जिसमें एक - से - बढ़कर एक तेजस्वी व मनस्वी नवयुवक शामिल थे जो उनके एक इशारे पर इस देश की व्यवस्था में आमूल परिवर्तन कर सकते थे किन्तु [[अहिंसा]] की दुहाई देकर उन्हें एक-एक करके मिटाने का क्रूरतम षड्यन्त्र जिन्होंने किया उन्हीं का चित्र [[भारतीय]] पत्र मुद्रा (Paper Currency) पर दिया जाता है। जबकि [[अमरीका]] में एक व दो अमरीकी डॉलर पर आज भी [[जॉर्ज वाशिंगटन]] का ही चित्र छपता है जिसने [[अमरीका]] को अँग्रेजों से मुक्त कराने में प्रत्यक्ष रूप से आमने-सामने [[युद्ध]] लड़ा था।
 
बिस्मिल की पहली पुस्तक सन् १९१६ में छपी थी जिसका नाम था-''अमेरिका की स्वतन्त्रता का इतिहास''। बिस्मिल के ''जन्म शताब्दी वर्ष: १९९६-१९९७'' में यह पुस्तक स्वतन्त्र भारत में फिर से प्रकाशित हुई जिसका विमोचन [[भारत]] के पूर्व प्रधानमन्त्री [[अटल बिहारी वाजपेयी]] ने किया।"<ref>[[हिन्दुस्तान (समाचार पत्र)]] (हिन्दी दैनिक) [[नई दिल्ली]], २० दिसम्बर १९९६, "क्रान्तिकारियों के साथ हमने न्याय नहीं किया": वाजपेयी, अभिगमन तिथि: २ अप्रैल २०१४</ref> उस कार्यक्रम में [[राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ]] के तत्कालीन सरसंघचालक प्रो॰ [[राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया)]] भी उपस्थित थे।<ref>[[दैनिक जागरण]] (हिन्दी दैनिक) [[नई दिल्ली]], २० दिसम्बर १९९६ "देशवासी महान क्रान्तिकारियों को भूल रहे हैं": वाजपेयी, अभिगमन तिथि: २ अप्रैल २०१४</ref> इस सम्पूर्ण ग्रन्थावली में बिस्मिल की लगभग दो सौ प्रतिबन्धित कविताओं के अतिरिक्त पाँच पुस्तकें भी शामिल की गयी थीं। परन्तु आज तक किसी भी सरकार ने बिस्मिल के क्रान्ति-दर्शन को समझने व उस पर शोध करवाने का प्रयास ही नहीं किया। जबकि गान्धी जी द्वारा १९०९ में विलायत से [[हिन्दुस्तान]] लौटते समय पानी के जहाज पर लिखी गयी पुस्तक [[हिन्द स्वराज]] पर अनेकोँ संगोष्ठियाँ हुईं। बिस्मिल सरीखे असंख्य शहीदों के सपनों का भारत बनाने की आवश्यकता है।
 
== साहित्य रचना ==
* '''[[सरफरोशी की तमन्ना]]''': बिस्मिल की यह गज़ल क्रान्तिकारी जेल से पुलिस की लारी में अदालत में जाते हुए, अदालत में मजिस्ट्रेट को चिढ़ाते हुए व अदालत से लौटकर वापस जेल आते हुए कोरस के रूप में गाया करते थे। बिस्मिल के बलिदान के बाद तो यह रचना सभी क्रान्तिकारियों का मन्त्र बन गयी<ref>{{cite book |last1=आशारानी |first1=व्होरा|authorlink1= |last2= |first2= |editor1-first= |editor1-last= |editor1-link= |others= |title=स्वाधीनता सेनानी लेखक पत्रकार |url=http://www.worldcat.org/title/swadhinata-senani-lekhaka-ptrakara/oclc/57285032&referer=brief_results |format= |accessdate=14 May 2014 |edition=1 |series= |volume= |date= |year=२००४ |month= |origyear= |publisher=[[प्रतिभा प्रतिष्ठान]]|location=[[नई दिल्ली]]|isbn=9788188266234|oclc= 57285032 |doi= |id= |page=18 |pages=260 |chapter= |chapterurl= |quote= |ref= |bibcode= |laysummary= |laydate= |separator= |postscript= |lastauthoramp=}}</ref>।
* '''जज्वये-शहीद''' (बिस्मिल का मशहूर उर्दू [[मुखम्मस]]): बिस्मिल का यह यह [[उर्दू]] मुखम्मस भी उन दिनों सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ करता था यह उनकी अद्भुत रचना है यह इतनी अधिक भावपूर्ण है कि लाहौर कान्स्पिरेसी केस के समय जब '''प्रेमदत्त''' नाम के एक कैदी ने अदालत में गाकर सुनायी थी तो श्रोता रो पड़े थे<ref>खलीक अंजुम मुज्तबा हुसैन ''जब्तशुदा नज्में'' पृष्ठ-१८ नूरनबी अब्बासी ''जब्तशुदा नज्में'' पृष्ठ-२९</ref>। जज अपना फैसला तत्काल बदलने को मजबूर हो गया और उसने प्रेमदत्त की सजा उसी समय कम कर दी थी। अदालत में घटित इस घटना का उदाहरण भी [[इतिहास]] में दर्ज़ हो गया।
* '''जिन्दगी का राज''' ( बिस्मिल की एक अन्य उर्दू गजल ): बिस्मिल की इस गजल में जीवन का वास्तविक दर्शन निहित है शायद इसीलिये उन्होंने इसका नाम ''राजे मुज्मिर'' या ''जिन्दगी का राज मुजमिर''<ref>खलीक अंजुम मुज्तबा हुसैन ''जब्तशुदा नज्में'' पृष्ठ-१४ नूरनबी अब्बासी ''जब्तशुदा नज्में'' पृष्ठ-२५</ref> (कहीं-कहीं यह भी मिलता है) दिया था। वास्तव में अपने लिये जीने वाले मरने के बाद विस्मृत हो जाते हैं पर दूसरों के लिये जीने वाले हमेशा के लिये अमर हो जाते हैं।
* '''बिस्मिल की तड़प''' (बिस्मिल की अन्तिम रचना<ref>[[मन्मथनाथ गुप्त]] ''भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास'' पृष्ठ २१५</ref>): [[गोरखपुर]] जेल से चोरी छुपे बाहर भिजवायी गयी इस गजल में प्रतीकों के माध्यम से अपने साथियों को यह सन्देशा भेजा था कि अगर कुछ कर सकते हो तो जल्द कर लो वरना पछतावे के अलावा कुछ भी हाथ न आयेगा। बिस्मिल की आत्मकथा के अनुसार इस बात का उन्हें मलाल ही रह गया कि उनकी पार्टी का कोई एक भी नवयुवक उनके पास उनका रिवाल्वर तक न पहुँचा सका। उनके अपने वतन [[शाहजहाँपुर]] के लोग भी इसमें भागदौड़ के अलावा कुछ न कर पाये। बाद में इतिहासकारों ने न जाने क्या-क्या मन गढन्त लिख दिया।