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इतिहास
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(इतिहास)
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'''चुन्ने मियाँ का मन्दिर''' [[बरेली]] शहर में एक मुस्लिम व्यवसायी फजलुर्रहमान खां का बनबाया हुआ हिन्दू मन्दिर है जिसे चुन्ने मियाँ के नाम से ठीक उसी प्रकार जाना जाता है जैसे [[नई दिल्ली]] का बिरला मन्दिर। यह स्वतन्त्र [[भारत]] में हिन्दू-मुस्लिम एकता का अनुपम उदाहरण है।<ref name="चुन्ने मियाँ का मन्दिर">[http://www.nativeplanet.com/bareilly/attractions/chunne-miyan’s-lakshmi-narayan-temple/ चुन्ने मियाँ का लक्ष्मीनारायण मन्दिर, बरेली]
</ref>
 
बरेली शहर में बड़ा बाजार के पास कोहाड़ापीर क्षेत्र में स्थित इस मन्दिर में लक्ष्मीनारायण की भव्य मूर्तियाँ स्थापित की गयीं हैं।
 
16 मई, 1960 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. [[राजेन्द्र प्रसाद]] ने इसका विधिवत उद्घाटन किया था।<ref name="चुन्ने मियाँ का मन्दिर"></ref>
 
==इतिहास==
इस मन्दिर के बारे में जो जानकारी मिलती है उसके अनुसार भारत विभाजन के पश्चात बरेली आ बसे कुछ हिन्दुओं ने चुन्ने मियाँ के नाम से मशहूर एक मुस्लिम की जमीन पर पूजा-पाठ के लिये एक छोटा-सा मन्दिर बना लिया। पास में ही बुधवारी मस्ज़िद भी थी जिसमें मुसलमान नमाज पढ़ा करते थे। चुन्ना मियाँ बहुत पैसे वाले थे उनके पास शेर छाप बीड़ी की एजेंसी हुआ करती थी। उन्होंने जमीन पर कब्ज़ा करने वाले हिन्दू शरणार्थियों पर कोर्ट में केस दायर कर दिया।<ref name="चुन्ने मियाँ का मन्दिर"></ref>
 
मुकदमा चल ही रहा था तभी [[हरिद्वार]] से एक सन्यासी स्वामी हरमिलापी ने आकर फजलुर्रहमान खां साहब को समझाया कि मुस्लिमों के पास तो मस्ज़िद है परन्तु इन बेचारे हिन्दुओं के पास क्या है। आप तो सेठ चुन्ना मियाँ के नाम से मशहूर हो ये छोटा सा जमीन का टुकड़ा अपने इन हिन्दू भाइयों को मन्दिर बनाने के लिये दान नहीं दे सकते? कहते हैं कि चुन्ना मियाँ स्वामीजी की बात से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने न सिर्फ़ मुकदमा वापस लिया बल्कि लक्ष्मीनारायण भगवान का भव्य मन्दिर भी बनवा दिया। पूरे बरेली शहर में आज भी यह चुन्ने मियाँ के मन्दिर के नाम से जाना जाता है।<ref name="चुन्ने मियाँ का मन्दिर"></ref>
 
==सन्दर्भ==
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