"उत्परिवर्तन" के अवतरणों में अंतर

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हलान्त शब्द की पारम्परिक वर्तनी को आधुनिक वर्तनी से बदला।
छो (बॉट: विराम चिह्नों के बाद खाली स्थान का प्रयोग किया।)
छो (हलान्त शब्द की पारम्परिक वर्तनी को आधुनिक वर्तनी से बदला।)
उत्परिवर्तनों के महत्व के निम्नलिखित पक्ष हो सकते हैं-
 
'''उद्विकासीय महत्व''' - आरंभ में ही हमने देखा है कि सृष्टि के जीवजगत् में विविधता दृष्टिगोचर होती है। उद्विकास सिद्धांत (evolution theory) की मान्यता है कि यह सारा दृश्यजगत् अणु से ही महान्महान हुआ है। अर्थात् प्रत्येक महान्महान की इकाई कोई न कोई अणु है। यही अणु एक से दो, दो से चार, आठ, सोलह और अनंत तथा अकथ्य और अकल्पनीय गुणनों के दौर से गुजरता गुजरता दैत्याकार रूप धारण कर लेता है। जीवजगत् की विविधता के संबंध में कोई व्यवस्थित व्याख्या उपलब्ध नहीं है, तथापि इस संबंध में अब तक जो कुछ कहा सुना गया है, उसका सारांश इस प्रकार है-
 
जीवोत्पत्ति की आदिम अवस्थाओं में पृथ्वी का वातावरण अनिश्चित और भौगोलिक परिवेश आज जैसा नहीं था। भौतिक और रासायनिक दृष्टि से तत्कालीन धरती विशेष प्रकार के संक्रमण काल से होकर गुजर रही थी। वायुमंडलीय प्रभावों से जीव जंतुओं की आकृति, आकार, वर्ण, आदि पूर्णरूपेण प्रभावित थे। प्रकृति जीवों को संरक्षण प्रदान करने की स्थिति में नहीं थी। केवल वे ही जीव जीवित रह पाते थे, जो सबल थे। वायुमंडलीय प्रभाव शक्तिशाली होने के कारण कोमल जीवों के गुणसूत्रों में परिवर्तन हो जाना सामान्य बात रही होगी। इससे नए नए प्रकार के जीव जंतुओं का विकास तेजी से हुआ होगा। यही कारण है कि जिस तेजी से वे फैले उसी गति से समाप्त होते गए। उनका चिह्न, उनको सत्ता का प्रमाण, जीवाश्मों (fossils) में सिमटकर रह गए।