"जीव" के अवतरणों में अंतर

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हलान्त शब्द की पारम्परिक वर्तनी को आधुनिक वर्तनी से बदला।
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छो (हलान्त शब्द की पारम्परिक वर्तनी को आधुनिक वर्तनी से बदला।)
ब्रह्म एक ऐसी लोकोत्तर शक्ति है जो संपूर्ण ब्रह्मांड के कण-कण, क्षण-क्षण में व्याप्त है। यही लोकोत्तर शक्ति जब संसार की रचना करती है; सृष्टि का प्रवर्तन करती है; प्राणियों का संरक्षण करती है; उनका संहार करती है तो इसे ईश्वर की संज्ञा प्राप्त हो जाती है। ब्रह्म शब्द शक्तिपरकएवं सत्तापरकलोकोत्तर तत्त्‍‌व का बोधक है। ईश्वर और भगवान्भगवान जैसे शब्द ऐसे लोकोत्तर तत्त्‍‌व की सृष्टि विषयक भूमिका का बोध कराते हैं। ईश्वर सर्वशक्तिमान एवं सर्वव्यापक है। वह असीम है, पूर्णत:स्वतंत्र है। जीव की स्थिति ईश्वर से भिन्न होती है। जीव अल्प शक्तिमान है; उसकी ज्ञान एवं क्रिया सीमा भी अति न्यून है। वह ससीम है, पराश्रित है, परतंत्र है, ईश्वराधीन है। जीव असंख्य है। ईश्वर और जीव के बीच भेद स्पष्ट करते हुए गोस्वामी तुलसीदास अपनी अमरकृतिरामचरितमानस में लिखते हैं-
 
मायावस्यजीव अभिमानी। ईशवस्यमायागुणखानी।।परवसजीवस्ववसभगवंता।जीव अनेक एक श्रीकंता॥गोस्वामी जी के अनुसार ईश्वर और जीव के बीच तीन बिंदुओं पर भेद है :जीव माया के वश में रहता है, जबकि माया ईश्वर के वश में रहती है। जीव में परतंत्रताहोती है, जबकि ईश्वर स्वतंत्र होता है। जीव असंख्य होते हैं, जबकि ईश्वर एकमेवाद्वितीयहै।