"ज़मींदारी प्रथा" के अवतरणों में अंतर

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इस प्रथम चरण में, जो सन् 1859 ई0 से 1929 ई0 तक रहा, जो कानून बने उनसे जमींदारों के लगान बढ़ाने के अधिकारों पर कुछ प्रतिबंध लगाए गए और उच्च श्रेणी के कृषकों को लाभ भी हुए। किंतु इन कानूनों का मुख्य उद्देश्य जमींदारों को लगान वसूल करने में सहूलियत देने का था जिससे वे राज्य को राजस्व ठीक समय पर दे सकें। सन् 1959 ई0 में भूमि संबंधी पहला अधिनियम पास हुआ। यह अधिनियम समस्त ब्रिटिश भारत के लिये एक आदर्श भूमि-अधिनियम था जिसके अनुरूप अधिनियम भारत के सभी भागों में पास हुए और समय समय पर उनमें संशोधन भी किए गए ताकि असंतुष्ट कृषकों को शांत किया जा सके। किंतु जमींदार फिर भी कृषकों को अपने न्यायपूर्ण तथा अन्यायपूर्ण करों को वसूलने के लिये निचोड़ते रहे जिससे किसानों में घोर असंतोष तथा बेचैनी फैलेने लगी।
 
जमींदारी प्रथा के अस्त के क्रम में दूसरा चरण सन् 1930 ई0 से 1944 ई0 तक रहा। इस समय में सारे देश में किसान आंदोलन होने लगे। इन आंदोलनों का बीज एक किसान सभा ने बोया था जो अखिल भारतीय कांग्रेस की इलाहाबाद बैठक में तारीख 11 फरवरी,फ़रवरी सन् 1918 ई0 को हुई थी। तत्पश्चात् कांग्रेस किसानों के हितों को आगे बढ़ाने लगी। परिणाम स्वरूप ग्रामीण जनता में काफी जाग्रति पैदा हो गई। पं0 जवाहरलाल नेह डिग्री ने यू0 पी0 कांग्रेस कमेटी में तारीख 27 अक्टूबर, 1928 को घोषणा की कि राजनीतिक स्वतंत्रता निरर्थक है जब तक किसानों को शोषण से मुक्ति न प्राप्त हो। शनै: शनै: किसानों की जागरूकता बढ़ी और साथ ही साथ उनकी व्याकुलता भी। किसान वर्ग अब अधिक मुखर हो गया और भूधृति की स्थिरता एवं लगान में कमी की मांग करने लगा। किसान आंदोलनों से प्रभावित होकर रैय्यतवाड़ीक्षेत्रों में नए अधिनियम बनाए गए जिनसे कृषकों के हितों की रक्षा हो सके। मलाबार टेनेंसी ऐक्ट (1930 ई) इस संबंध में सीमाचिन्ह है। इसके बाद भोपाल लैंड रेवेन्यू ऐक्ट, 1935 तथा आसाम टेनेंसी ऐक्ट 1935 पास हुए। गवर्नमेंट ऑव इंडिया ऐक्ट, 1935, के अर्न्तगत जब ‘प्राविंशल आटोनोमी’ का उद्घाटन हुआ तो प्रांतीय सरकारों ने भूमिसुधार अधिनियमों की व्यवस्था की जिनमें कृषकों को और अधिकार प्रदान किए गए तथा जमींदारों के अधिकारों की कटौती की गई। यू0 पी0 टेनेंसी ऐक्ट, 1939, तथा बंबई टेनेंसी ऐक्ट, 1939 विशिष्ट उदाहरण ऐसे व्यापक अधिनियमों के हैं जिनके द्वारा कृषकों को मौरूसी अधिकार दिए गए एवं कृषकों के हित में जमींदारों के कतिपय अधिकार छीन लिए गए।
 
इन भूमि सुधार अधिनियमों के बनने पर भी जमींदारी प्रथा की बुराइयाँ विद्यमान रहीं, यद्यपि काफी हद तक जमींदारों को पंगु बना दिया गया था। इन जमींदारों को नेह डिग्री जी ‘ब्रिटिश सरकार की अतिलालित संतान (Spoilt child)’ कहा करते थे। वे भूतकालीन सामंतवादी प्रथा के प्रतीक थे जो कि आधुनिक परिस्थतियों के बिल्कुल प्रतिकूल हो गई थी। इसलिए इंडियन नेशनल कांग्रेस ने कई बार इस बात की घोषणा की कि जमींदारी उन्मूलन को कांग्रेस के कार्यक्रम में प्रमुख स्थान देना चाहिए। एक किसान कांफ्रेंस तारीख 27,28 अप्रैल सन् 1935 ई0 को सरदार पटेल के सभापतित्व में इलाहाबाद में हुई थी। उसने जमींदारी उन्मूलन को प्रस्ताव पास करके इस ओर एक प्रमुख कदम उठाया इस प्रस्ताव में यह घोषणा की गई थी कि ‘ग्रामकल्याण के दृष्टिकोण से वर्तमान जमींदारी प्रथा बिल्कुल विपरीत है। यह प्रथा ब्रिटिश शासन के आगमन में लाई गई और इससे ग्रामीण जीवन पूर्णतया तहस नहस हो गया है’। परंतु सन् 1939 ई0 में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो जाने के कारण भूमि सुधार का सारा कार्यक्रम रूक गया।
 
== बाहरी कड़ियाँ ==
* [http://www.newsweekly.com.au/articles/2000mar25_pfrcopm.html Sharif M. Shuja, "Feudalism: root cause of Pakistan’s malaise", National Civic Council (NCC) ''News Weekly'' (Australia) (25 Marchमार्च 2000).]
* [http://www.ahrchk.net/pr/mainfile.php/2004mr/108/ Asian Human Rights Commission, "Pakistan human rights impeded by military, feudal leaders", Press Release AHRC-PL-108-Pakistan-2004]
* [http://www.storyofpakistan.com/contribute.asp?artid=C067 Zamindar Newspaper by Maulana Zafar Ali khan]