"लोकपाल" के अवतरणों में अंतर

9 बैट्स् नीकाले गए ,  7 वर्ष पहले
छो
बॉट: विराम चिह्नों के बाद खाली स्थान का प्रयोग किया।
छो (बॉट: डॉट (.) के स्थान पर पूर्णविराम (।) और लाघव चिह्न प्रयुक्त किये।)
छो (बॉट: विराम चिह्नों के बाद खाली स्थान का प्रयोग किया।)
सन 1967 के मध्य तक ओम्बुड्समैन (लोकपाल) संस्था 12 देशों मेंफैल गई थी। भारत में भारतीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने प्रशासन के विरूद्व नागरिको की शिकायतो को सुनने एंव प्रशासकीय भ्रष्टाचार रोकने के लिए सर्वप्रथम लोकपाल संस्था की स्थापना का विचार रखा था जिसे स्वीकार नही किया गया। भारत में सन 1971 में लोकपाल विधेयक प्रस्तुत किया गया जो पाँचवी लोकसभा के भंग हो जाने से पारित न हो सका। [[राजीव गाँधी]] के प्रधानमंत्री बनने के बाद लोकपाल विधेयक 26 अगस्त1985 को संसद में प्रस्तुत किया गया और 30 अगस्त 1985 को संसद में इस विधेयक के प्रारूप को पुनर्विचार के लिए संयुक्त प्रवर समिती को सौंप दिया, जो पारित न हो सका।
 
वर्तमान में समाजसेवी [[अन्ना हजारे]] लोकपाल विल लाने के लिए देशवासियों को प्ररित कर रहे है एवं राजनीतिज्ञों से मिल रहे है लेकिन अन्ना हजारे व कपिल सिब्बल के बीच आम सहमति न बन पाने के कारण यह विधेयक चर्चां के घेरे में है। प्रशन यह है कि भारत में लोकपाल विधेयक के दायरे में राष्टपति, उपराष्टपति, प्रधानमंत्री, केन्द्रिय मंत्रीयो, शीर्ष न्यायपालिका व लोकसभा अध्यक्ष आदि को रखा जाए। इसके लिए हमें विभिन्न देशों में विधमान ओम्बुड्समैन (लोकपाल) के दायरे में आने वाले मंत्रीयो, लोकसेवकों व न्यायपालिका के सन्दर्भ की परिस्थितयों का अध्ययन करके भारतीय संविधान का आदर करते हुए, भारतीय परिस्थितयों के अनुकूल लोकपाल के दायरे में लोकसेवको व मंत्रीयो आदि को रखा जाए।
 
विदेशों में प्राप्त लोकपाल के कार्यक्षेत्र में आने वाले अधिकारियों, मंत्रियों आदि के बारे में ज्ञान प्राप्त करके भारत में भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए विभिन्न अधिकारियों को इसके दायरे में लाना चाहिए। स्वीडन के लोकपाल के जांच के दायरे में असैनिक प्रशासकीय कर्मचारियों के अलावा न्यायाधीशों तथा पादरियों को भी रखा गया है किन्तु मन्त्रीगण उनके क्षेत्राधिकार से बाहर होते है ताकि संसदीय उत्तरदायित्व विभाजित न हो जाए। डेनमार्क में लोकपाल मंत्रियों तथा लोक कर्मचारियों की तो जांच कर सकता है परन्तु न्यायाधीशों के कार्य और व्यवहार पर टिप्पड़ी नहीं कर सकता। न्यूजीलैण्ड में लोकपाल को मंत्री पर प्रत्यक्ष नियन्त्रण रखने का अधिकार नहीं है। विदेशी सम्बंध, अन्तर्देशीय राजस्व और प्रधानमंत्रीय विभाग भी उसके क्षेत्र के बाहर है। जबकि ब्रिटेन में लोकपाल की जांच के दायरे में सभी मंत्रालय, विभाग, सिविल सेवा आयोग, केन्द्रीय सूचना कार्यालय आदि आते हैं। विदेश सम्बन्ध, सुरक्षा, कर्मचारी प्रशासन, पुलिस क्रिया, निगम, सरकारी ठेके आदि को लोकपाल की जांच के दायरे से बाहर रखा गया है।
 
== इन्हें भी देखिये ==