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'''वाराणसी''' ([[अंग्रेज़ी]]: ''Vārāṇasī'', {{IPA-hns|ʋaːˈɾaːɳəsiː|-|hi-Varanasi.ogg}}) [[भारत]] के [[उत्तर प्रदेश]] राज्य का प्रसिद्ध शहर है। इसे 'बनारस' और '[[काशी]]' भी कहते हैं। इसे [[हिन्दू धर्म]] में सर्वाधिक पवित्र शहर माना जाता है और इसे '''अविमुक्त क्षेत्र''' कहा जाता है। {{Ref_label|अविमुक्तं |च|none}}{{Ref_label|अविमुक्तं२ |छ|none}}<ref>[[महाभारत]], [[वन पर्व]]., ८४/१८</ref><ref>([[महाभारत]], [[वन पर्व]]., ८२/७७)</ref><ref>संदर्भ:[http://tdil.mit.gov.in/CoilNet/IGNCA/kv_0012.htm काशी तथा वाराणसी का तीर्थ स्वरुप]।वाराणसी। वाराणसी वैभव</ref><ref>[http://dharmadesh.mywebdunia.com/2009/10/29/1256835420001.html काशी- मुक्ति की जन्मभूमि]।माई। माई वेब दुनिया।२९दुनिया। २९ अक्तूबर, २००९।अभिगमन२००९। अभिगमन तिथि:२५ अप्रैल, २०१०</ref> इसके अलावा [[बौद्ध]] एवं [[जैन धर्म]] में भी इसे पवित्र माना जाता है। यह संसार के प्राचीनतम बसे शहरों में से एक और भारत का प्राचीनतम बसा शहर है।<ref name=bsfw>{{cite book |last=लैनोय|first=रिचर्ड|title=बनारस-सीन फ़्रॉम विदिन|publisher=वॉशींग्टन प्रेस विश्वविद्यालय |pages=ब्लैक फ्लैप|date=अक्तूबर, १९९९|isbn=029597835X | oclc = 42919796 |nopp=true}}</ref><ref>{{cite web |url=http://www.britannica.com/eb/article-9074835/Varanasi |title=वाराणसी|publisher=[[ब्रिटैनिका विश्वकोश]] |accessdate=३ जून, २००८}}</ref>
 
[[काशी नरेश]] (काशी के महाराजा) वाराणसी शहर के मुख्य सांस्कृतिक संरक्षक एवं सभी धार्मिक क्रिया-कलापों के अभिन्न अंग हैं।<ref name = Goodearth>{{cite book
| chapter
| doi =
| id = }}</ref> कृत्यकल्पतरु में दिये तीर्थ-विवेचन व अन्य प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार<ref name="दीनदयाल">[http://kashivishvanath.blogspot.com/2009/08/blog-post_27.html वाराणसी वैभव या काशी वैभव] काशीविश्वनाथ।दीनदयालकाशीविश्वनाथ। मणि।२७दीनदयाल मणि। २७ अगस्त, २००९</ref>:
* [[ब्रह्म पुराण]] में भगवान [[शिव]] [[पार्वती]] से कहते हैं कि- हे सुरवल्लभे, वरणा और असि इन दोनों नदियों के बीच में ही वाराणसी क्षेत्र है, उसके बाहर किसी को नहीं बसना चाहिए।
* [[मत्स्य पुराण]]<ref>[[म्त्स्य पुराण]], की मुद्रित प्रति (१८४/५१)</ref> में इसकी लम्बाई-चौड़ाई अधिक स्पष्ट रुप से वर्णित है। [[पूर्व]]-[[पश्चिम]] ढ़ाई (२½) [[योजन]] भीष्मचंडी से पर्वतेश्वर तक, उत्तर-दक्षिण आधा (<sup>1</sup>/<sub>2</sub>) योजन, शेष भाग वरुणा और अस्सी के बीच। उसके बीच में मध्यमेश्वर नामक [[स्वयंभू]] लिंग है। यहां से भी एक-एक कोस चारों ओर क्षेत्र का विस्तार है। यही वाराणसी की वास्तविक सीमा है। उसके बाहर विहार नहीं करना चाहिए।<ref name="दीनदयाल"/>
=== नदियाँ ===
{{मुख्य|वाराणसी की नदियां}}
वाराणसी या काशी का विस्तार प्रायः गंगा नदी के दो संगमों: एक [[वरुणा नदी]] से और दूसरा [[असी नदी]] से संगम के बीच बताया जाता है। इन संगमों के बीच की दूरी लगभग २.५&nbsp;मील है। इस दूरी की परिक्रमा (दोनों ओर की यात्रा) हिन्दुओं में [[पंचकोसी यात्रा]] या '''पंचकोसी परिक्रमा''' कहलाती है। इसक यात्रा का समापन [[साक्षी विनायक मंदिर]] में किया जाता है। वाराणसी क्षेत्र में अनेक छोटी बड़ी नदियां बहती हैं। इनमें सबसे प्रमुख नदी तो गंगा ही है, किंतु इसके अलावा अन्य बहुत नदियां हैं जैसे गंगा, बानगंगा, वरुणा, गोमती, करमनासा, गड़ई, चंद्रप्रभा, आदि। बनारस जिले की नदियों के विस्तार से अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि बनारस में तो प्रस्रावक नदियां है लेकिन चंदौली में नहीं है जिससे उस जिले में झीलें और दलदल हैं, अधिक बरसात होने पर गांव पानी से भर जाते हैं तथा फसल को काफी नुकसान पहुंचता है। नदियों के बहाव और जमीन की के कारण जो हानि-लाभ होता है इससे प्राचीन आर्य अनभिज्ञ नहीं थे और इसलिए सबसे पहले आबादी बनारस में हुई।<ref name="नदियां">[http://kashivishvanath.blogspot.com/2009/08/blog-post_1164.html वाराणसी की नदियाँ]।काशीविश्वनाथ।गुरुवार। काशीविश्वनाथ। गुरुवार, २७ अगस्त २००९</ref>
 
=== जलवायु ===
वाराणसी में [[आर्द्र अर्ध-कटिबन्धीय जलवायु]] ([[:en: Köppen climate classification|कोप्पन जलवायु वर्गीकरण]] ''Cwa'' के अनुसार) है जिसके संग यहां [[ग्रीष्म ऋतु]] और [[शीत ऋतु]] ऋतुओं के तापमान में बड़े अंतर हैं। ग्रीष्म काल [[अप्रैल]] के आरंभ से [[अक्तूबर]] तक लंबे होते हैं, जिस बीच में ही [[वर्षा ऋतु]] में [[मानसून]] की वर्षाएं भी होती हैं। [[हिमालय]] क्षेत्र से आने वाली शीत लहर से यहां का तापमान [[दिसंबर]] से [[फरवरी]] के बीच [[शीतकाल]] में गिर जाता है। यहां का तापमान ३२[[सेल्सियस|° से.]]{{ndash}} ४६°C (९०[[फैरनहाइट|° फै.]]{{ndash}} ११५°फै.) ग्रीष्म काल में, एवं ५°से.{{ndash}} १५°से. (४१°फै.{{ndash}} ५९°फै.) शीतकाल में रहता है।<ref name=varanasiairtrip/> औसत वार्षिक वर्षा १११०&nbsp;मि.मी. (४४&nbsp;इंच) तक होती है।<ref name=delhitourism>{{cite web |url=http://www.delhitourism.com/varanasi-tourism/ |title=वाराणसी पर्यटन|accessdate=१८ अगस्त, २००६|publisher=DelhiTourism.com}}</ref> ठंड के मौसम में [[कुहरा]] सामान्य होता है और गर्मी के मौसम में [[लू हवा|लू]] चलना सामान्य होता है।
 
यहां निरंतर बढ़ते [[जल प्रदूषण]] और निर्माण हुए बांधों के कारण स्थानीय तापमान में वृद्धि दर्ज हुई है। गंगा का जलस्तर पुराने समय से अच्छा खासा गिर गया है और इस कारण नदी के बीच कुछ छोटे द्वीप भी प्रकट हो गये हैं। इस प्राचीन शहर में पानी का जलस्तर इतना गिर गया है कि इंडिया मार्क-२ जैसे हैंडपंप भी कई बार चलाने के बाद भी पानी की एक बूंद भी नहीं निकाल पाते। वाराणसी में गंगा का जलस्तर कम होना भी एक बड़ी समस्या है। गंगा के जल में प्रदूषण होना सभी के लिए चिंता का विषय था, लेकिन अब इसका प्रवाह भी कम होता जा रहा है, जिसके कारण [[उत्तराखंड]] से लेकर [[बंगाल की खाड़ी]] तक चिंता जतायी जा रही है।<ref>[http://samaylive.com/regional-hindi/up-hindi/80149.html वाराणसी के घटते जल स्तर पर चिंता]।समय लाईव।२९समय लाईव। २९ अप्रैल, २०१०</ref>
{{-}}
{{Infobox weather
# '''[[बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय]]''' जिसकी स्थापना १९१६ में पं.[[मदन मोहन मालवीय]] ने [[एनी बेसेंट]] के सहयोग से की थी। इसका १३५०&nbsp;एकड़ (५.५&nbsp;वर्ग कि.मी.) में फैला परिसर [[काशी नरेश]] द्वारा दान की गई भूमि पर निर्मित है। इस विश्वविद्यालय में [[भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान]] (आई.आई.टी-बी.एच.यू) एवं आयुर्विज्ञान संस्थान विश्व के सर्वोच्च तीन एवं सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक हैं। यहां १२८ से अधिक स्वतंत्र शैक्षणिक विभाग हैं।<ref name=surfBHU>{{cite web |url=http://www.surfindia.com/travel/uttar-pradesh/banaras-hindu-university.html |title=Banaras Hindu University |accessdate=2006-08-18 |publisher=SurfIndia}}</ref>
# '''[[संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय]]:''' [[भारत के गवर्नर जनरल]] [[लॉर्ड कॉर्नवालिस]] ने इस संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना १७९१ में की थी। ये वाराणसी का प्रथम महाविद्यालय था। इस महाविद्यालय के प्रथम प्रधानाचार्य संस्कृत प्राध्यापक जे म्योर, [[भारतीय सिविल सेवा|आई.सी.एस]] थे। इनके बाद जे.आर.बैलेन्टियन, आर.टी.एच.ग्रिफ़िथ, डॉ॰जी.थेवो, डॉ॰आर्थर वेनिस, डॉ॰गंगानाथ झा और गोपीनाथ कविराज हुए। [[भारतीय स्वतंत्रता]] उपरांत इस महाविद्यालय को विश्वविद्यालय बनाकर वर्तमान नाम दिया गया।<ref>आचार्य [[बलदेव उपाध्याय]], काशी की पांडित्य परंपरा। विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी।१९८३वाराणसी। १९८३</ref>
# '''[[महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ]]''' एक मानित राजपत्रित विश्वविद्यालय है। इसका नाम भारत के राष्ट्रपिता [[महात्मा गांधी]] के नाम पर है और यहां उनके सिद्धांतों का पालन किया जाता है।
# '''[[सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइयर टिबेटियन स्टडीज़]]''' [[सारनाथ]] में स्थापित एक मानित विश्वविद्यालय है। यहां परंपरागत तिब्बती पठन-पाठन को आधुनिक शिक्षा के साथ वरीयता दी जाती है।<ref name=cihts>{{cite web |url=http://www.varanasicity.com/education/tibetan-university.html |title=[[सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइयर टिबेटियन स्टडीज]] |accessdate=१८ अगस्त, २००६|publisher=वाराणसी सिटी}}</ref> [[उदय प्रताप कॉलिज]], एक स्वायत्त महाविद्यालय है जहां आधुनिक बनारस के उपनगरीय छात्रों हेतु क्रीड़ा एवं विज्ञान का केन्द्र है। वाराणसी में बहुत से निजी एवं सार्वजनिक संस्थान है, जहां हिन्दू धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था है। प्राचीन काल से ही लोग यहां दर्शन शास्त्र, संस्कृत, खगोलशास्त्र, सामाजिक ज्ञान एवं धार्मिक शिक्षा आदि के ज्ञान के लिये आते रहे हैं। भारतीय परंपरा में प्रायः वाराणसी को ''सर्वविद्या की राजधानी'' कहा गया है।<ref name=varanasicityedu>{{cite web |url=http://www.varanasicity.com/education/index.html
== पवित्र नगरी ==
[[चित्र:Benares 1.JPG|thumb|200px|right|वाराणसी के एक घाट पर लोग हिन्दू रिवाज करते हुए।]]
वाराणसी या काशी को [[हिन्दू धर्म]] में पवित्रतम नगर बताया गया है। यहां प्रतिवर्ष १० लाख से अधिक तीर्थ यात्री आते हैं।<ref name="यात्रा सलाह">[http://www.yatrasalah.com/touristplaces.aspx?id=30 शिव की नगरी]- वाराणसी।अभिगमनवाराणसी। अभिगमन तिथि:२९ अप्रैल, २०१०</ref> यहां का प्रमुख आकर्षण है [[काशी विश्वनाथ]] मंदिर, जिसमें भगवान शिव के [[ज्योतिर्लिंग|'''बारह ज्योतिर्लिंग''']] में से प्रमुख शिवलिंग यहां स्थापित है।{{Ref_label|ज्योतिर्लिंग|झ|none}}<ref>[http://sanskritdocuments.org/all_sa/jyotirling_sa.html द्वादश ज्योतिर्लिङ्गानि ]।संस्कृत। संस्कृत अभिलेख। अभिलेख।सुब्रह्मण्यमसुब्रह्मण्यम गणेश, आशीष चंद्रा</ref><ref>[http://vinaysv.blogspot.com/2009/07/blog-post_24.html शिव के बारह ज्योतिर्लिंग ]</ref>
 
हिन्दू मान्यता अनुसार गंगा नदी सबके पाप मार्जन करती है और काशी में मृत्यु सौभाग्य से ही मिलती है और यदि मिल जाये तो आत्मा पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो कर मोक्ष पाती है। [[इक्यावन शक्तिपीठ]] में से एक [[विशालाक्षी मंदिर]] यहां स्थित है, जहां भगवती [[सती]] की कान की मणिकर्णिका गिरी थी। वह स्थान [[मणिकर्णिका घाट]] के निकट स्थित है।<ref name=leaflet2/> हिन्दू धर्म में शाक्त मत के लोग देवी गंगा को भी [[दुर्गा|शक्ति]] का ही अवतार मानते हैं। जगद्गुरु [[आदि शंकराचार्य]] ने [[हिन्दू धर्म]] पर अपनी टीका यहीं आकर लिखी थी, जिसके परिणामस्वरूप हिन्दू पुनर्जागरण हुआ। काशी में [[वैष्णव]] और [[शैव]] संप्रदाय के लोग सदा ही धार्मिक सौहार्द से रहते आये हैं।
भारत की सबसे बड़ी नदी [[गंगा]] करीब २,५२५ किलोमीटर की दूरी तय कर गोमुख से गंगासागर तक जाती है। इस पूरे रास्ते में गंगा उत्तर से दक्षिण की ओर यानि उत्तरवाहिनी बहती है।<ref name="यात्रा सलाह"/><ref name="कला केन्द्र"/> केवल वाराणसी में ही गंगा नदी दक्षिण से उत्तर दिशा में बहती है। यहां लगभग ८४ घाट हैं। ये घाट लगभग ६.५ किमी लं‍बे तट पर बने हुए हैं। इन ८४ घाटों में पांच घाट बहुत ही पवित्र माने जाते हैं। इन्हें सामूहिक रुप से 'पंचतीर्थी' कहा जाता है। ये हैं अस्सी घाट, दशाश्वमेध घाट, आदिकेशव घाट, पंचगंगा घाट तथा मणिकर्णिक घाट। अस्सी ‍घाट सबसे दक्षिण में स्थित है जबकि आदिकेशवघाट सबसे उत्तर में स्थित हैं।<ref>घाटों के सौंदर्य के संबंध में प्रख्यात कला समीक्षक श्री ई. बी. हैवेल ने कहा है -- ये घाट छः मील की परिधि में फैले प्रेक्षागृह की तरह शोभायमान होते हैं। प्रातःकाल, सुनहरी धूप में चमकते गंगा तट के मंदिर, मंत्रोच्चार और गायत्री जाप करते ब्राह्मणों और पूजा- पाठ में लीन महिलाओं के स्नान- ध्यान के क्रम के साथ ही दिन चढ़ता जाता है। पुष्प और पूजन सामग्रियों से सजे गंगा तट तथा पानी में तैरते फूलों की शोभा मनमोहक होती है।: [http://tdil.mit.gov.in/coilnet/ignca/kvj0049.htm काशी के घाट]</ref>
=== घाट ===
वाराणसी में १०० से अधिक घाट हैं। शहर के कई घाट [[मराठा साम्राज्य]] के अधीनस्थ काल में बनवाये गए थे। वर्तमान वाराणसी के संरक्षकों में मराठा, शिंदे ([[:श्रेणी:सिंधिया परिवार|सिंधिया]]), [[:श्रेणी:होल्कर परिवार|होल्कर]], [[:श्रेणी:भोंसले परिवार|भोंसले]] और [[पेशवा]] परिवार रहे हैं। अधिकतर घाट स्नान-घाट हैं, कुछ घाट अन्त्येष्टि घाट हैं। कई घाट किसी कथा आदि से जुड़े हुए हैं, जैसे मणिकर्णिका घाट, जबकि कुछ घाट निजी स्वामित्व के भी हैं। पूर्व [[काशी नरेश]] का शिवाला घाट और काली घाट निजी संपदा हैं। {{बनारस के घाट}}<ref name="कला केन्द्र">[http://tdil.mit.gov.in/coilnet/ignca/kvj0049.htm काशी के घाट]।इंदिरा। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र।सुनीलकेन्द्र। झा।अभिगमनसुनील झा। अभिगमन तिथि:२९ अप्रैल, २०१०</ref><ref>[http://www.jagranyatra.com/?p=2014 बनारस : हर घाट का निराला है ठाठ]।जागयणयात्रा। जागयणयात्रा</ref>
{{Panorama
{{मुख्य|वाराणसी के प्रमुख मंदिर}}
[[चित्र:Older Durga Temple - Banaras.jpg|thumb|right|250px|रामनगर, वाराणसी में दुर्गा मंदिर]]
वाराणसी मंदिरों का नगर है। लगभग हर एक चौराहे पर एक मंदिर तो मिल ही जायेगा। ऐसे छोटे मंदिर दैनिक स्थानीय अर्चना के लिये सहायक होते हैं। इनके साथ ही यहां ढेरों बड़े मंदिर भी हैं, जो वाराणसी के इतिहास में समय समय पर बनवाये गये थे। इनमें काशी विश्वनाथ मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर, ढुंढिराज गणेश, काल भैरव, दुर्गा जी का मंदिर, संकटमोचन, तुलसी मानस मंदिर, नया विश्वनाथ मंदिर, भारतमाता मंदिर, संकठा देवी मंदिर व विशालाक्षी मंदिर प्रमुख हैं।<ref name="जागरण मंदिर">[http://www.jagranyatra.com/?p=2018 शहर मंदिरों का]।जागरण यात्रा।अभिगमनजागरण यात्रा। अभिगमन तिथि:[[२९ अप्रैल]], [[२०१०]]</ref>
 
'''[[काशी विश्वनाथ मंदिर]]''', जिसे कई बार स्वर्ण मंदिर भी कहा जाता है,<ref name=route>{{cite web |url= http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/42205744.cms |title= द रिलीजियस रूट|accessdate=४ दिसंबर, २००८|last= |first= |coauthors= |date= ३ अप्रैल, २००३|work= [[द टाइम्स ऑफ इंडिया]] |publisher=}}</ref> अपने वर्तमान रूप में १७८० में [[इंदौर]] की महारानी [[अहिल्या बाई होल्कर]]द वारा बनवाया गया था। ये मंदिर गंगा नदी के दशाश्वमेध घाट के निकट ही स्थित है। इस मंदिर की काशी में सर्वोच्च महिमा है, क्योंकि यहां विश्वेश्वर या विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग स्थापित है। इस ज्योतिर्लिंग का एक बार दर्शनमात्र किसी भी अन्य ज्योतिर्लिंग से कई गुणा फलदायी होता है। १७८५ में तत्कालीन गवर्नर जनरल [[वार्रन हास्टिंग्स]] के आदेश पर यहां के गवर्नर मोहम्मद इब्राहिम खां ने मंदिर के सामने ही एक नौबतखाना बनवाया था। १८३९ में [[पंजाब]] के शासक पंजाब केसरी [[महाराजा रणजीत सिंह]] इस मंदिर के दोनों शिखरों को स्वर्ण मंडित करवाने हेतु स्वर्ण दान किया था। २८ जनवरी, १९८३ को मंदिर का प्रशासन [[उत्तर प्रदेश]] सरकार नेल लिया और तत्कालीन काशी नरेश [[डॉ॰विभूति नारायण सिंह]] की अध्यक्षता में एक न्यास को सौंप दिया। इस न्यास में एक कार्यपालक समिति भी थी, जिसके चेयरमैन मंडलीय आयुक्त होते हैं।<ref>{{cite web |url=http://varanasi.nic.in/temple/KASHI.html |title=श्री काशिविश्वनाथ मंदिर, वाराणसी |publisher=राष्ट्रीय सूचना केन्द्र, भारत सरकार|accessdate=४ फरवरी, २००७}}</ref>
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:* '''क.'''&nbsp;&nbsp;&nbsp; {{Note_label|महाभारत१|क|none}}अविमुक्तं समासाद्य तीर्थसेवी कुरुद्वह। दर्शनादेवदेस्य मुच्यते ब्रह्महत्यया ॥
:* '''ख.'''&nbsp;&nbsp;&nbsp; {{Note_label|महाभारत२|ख|none}}ततो वाराणसीं गत्वा देवमच्र्य वृषध्वजम्।कपिलाऊदमुपस्पृश्यवृषध्वजम्। कपिलाऊदमुपस्पृश्य राजसूयफलं लभेत् ॥
:* '''ग.'''&nbsp;&nbsp;&nbsp; {{Note_label|महाभारत३|ग|none}}भौमानामपि तीर्थनां पुणयत्वे कारणं ॠणु। यथा शरीरस्योधेशा: केचित् पुण्यतमा: समृता:॥
:::पृथिव्यामुधेशा: केचित् पुण्यतमा: समृता:।प्रभावाध्दभुताहभूमे। प्रभावाध्दभुताहभूमे सलिलस्य च तेजसा।
:::परिग्रहान्युनीमां च तीर्थानां पुण्यता स्मृता॥
:* '''घ.'''&nbsp;&nbsp;&nbsp; {{Note_label|जाबाल|घ|none}}अविमुक्तं वै देवानां देवयजनं सर्वेषां भूतानां ब्रह्मसदनमत्र हि जन्तो:
:::मोक्षीभवती तस्मादविमुक्तमेव निषेविताविमुक्तं न विमुञ्चेदेवमेवैतद्याज्ञवल्क्यः।
:* '''च.'''&nbsp;&nbsp;&nbsp; {{Note_label|अविमुक्तं |च|none}}अविमुक्तं समासाद्य तीर्थसेवी कुरुद्वह। :दर्शनादेवदेस्य मुच्यते ब्रह्महत्यया॥
:* '''छ.'''&nbsp;&nbsp;&nbsp; {{Note_label|अविमुक्तं२ |छ|none}}ततो वाराणसीं गत्वा देवमच्र्य वृषध्वजम्।कपिलाऊदमुपस्पृश्यवृषध्वजम्। कपिलाऊदमुपस्पृश्य राजसूयफलं लभेत् ॥
:* '''झ.'''&nbsp;&nbsp;&nbsp; {{Note_label|ज्योतिर्लिंग|झ|none}}'''[[ज्योतिर्लिंग|द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम्]]'''
:::सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥
:::एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः। सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥
:::एतेशां दर्शनादेव पातकं नैव तिष्ठति। कर्मक्षयो भवेत्तस्य यस्य तुष्टो महेश्वराः॥
::'''अर्थात''':[[सौराष्ट्र]] प्रदेश ([[काठियावाड़]]) में श्री [[सोमनाथ]], [[श्रीशैल]] पर श्री [[श्री शैलम देवस्थानम|मल्लिकार्जुन]], [[उज्जयिनी]] में श्री [[महाकालेश्वर|महाकाल]], [[ओंकारेश्वर]], अमलेश्वर, परली में [[वैद्यनाथ मंदिर, देवघर|वैद्यनाथ]], डाकिनी नामक स्थान में श्री[[भीमाशंकर मंदिर|भीमशंकर]], [[सेतुबंध]] पर श्री [[रामेश्वर]], दारुकावन में श्री[[नागेश्वर मंदिर, द्वारका|नागेश्वर]], वाराणसी ([[काशी]]) में श्री [[विश्वनाथ]], [[गौतमी]] ([[गोदावरी]]) के तट पर श्री [[त्र्यम्बकेश्वर]], [[हिमालय]] पर श्री[[केदारनाथ]] और शिवालय में श्री [[घृष्णेश्वर मंदिर|घृष्णेश्वर]], को स्मरण करें। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल और संध्या के समय इन बारह ज्योतिर्लिंगों का नाम लेता है, उसके सात जन्मों का किया हुआ पाप इन लिंगों के स्मरण-मात्र से मिट जाता है।
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== संदर्भ ==