"फर्दिनान्द द सस्यूर" के अवतरणों में अंतर

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सन्‌ 1880 ई. में सस्यूर जर्मनी छोड़कर फ्रांस आए। पेरिस में उन्होंने लगभग दस वर्षों तक ऐतिहासिक भाषाविज्ञान का अध्ययन किया। कालांतर में वे पेरिस की भाषाविज्ञान संबंधी संस्था के सदस्य बने। जर्मनी से लौटने के बाद एक सक्रिय सदस्य के रूप में नवयुवक भाषाविद्‌ सस्यूर ने समाज में एक महत्त्व्पूर्ण स्थान बना लिया। जेनेवा विश्वविद्यालय में सन्‌ 1907 ई. में उन्हें सामान्य भाषाविज्ञान के अध्यापन का अवसर प्राप्त हुआ। एक वर्ष के अंतराल पर उनहोंने इस विषय में सन्‌ 1907, 1909 एवं 1911 में तीन बार अध्ययन-अध्यापन कार्य किया। यह व्याख्यान माला ही उनकी पुस्तक का आधार बनी, जिसे उनके दो प्रबुद्ध सहयोगियों बेली और सेचहावे ने सन्‌ 1913 ई. में ‘कोर्स ऑफ लिंग्विस्टिक’ नामक जर्नल में संपादित किया। सस्यूर के नोट्स न के बराबर थी, न ही सस्यूर ने अपने जीवन में किताब लिखी।
 
फरवरी 1913 ई. में 53 वर्ष की अल्पावस्था में सस्यूर की मृत्यु हो गई। अपने जीवन काल में सस्यूर ने स्वयं बहुत कम लिखा। डॉक्टरेट उपाधि के लिए लिखे गए अपने शोध ग्रंथ के अतिरिक्त उन्होंने कोई पुस्तक नहीं लिखी। 4 फरवरीफ़रवरी 1854 ई. को लिखे गए उनके एक पत्र से यह संकेत अवश्य प्राप्त होता है कि वे भाषाविज्ञान पर एक सैद्धांतिक पुस्तक लिखना चाहते थे।
 
अविस्मरणीय भाषाविद्‌ सस्यूर ने अपने जीवन काल में बहुत कम लेखन कार्य किया। पर इतना कम लिख कर भी वे आज भाषा-चिंतन के क्षेत्र में अमर हैं। वे स्वयं इस बात के अनूठे उदाहरण हैं कि अध्यापक-चिंतक के लिए अध्यापन, लेखन अधिक प्रभावकारी हो सकता है।