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इन्होंने परिचयात्मक और आलोचनात्मक ग्रंथ लिखने के साथ ही कई दर्जन पुस्तकों का संपादन किया। पाठ्यपुस्तकों के रूप में इन्होंने कई दर्जन सुसंपादित संग्रह ग्रंथ प्रकाशित कराए। इनकी प्रमुख पुस्तकें हैं - हिंदी कोविद रत्नमाला भाग 1, 2 (1909-1914), साहित्यालोचन (1922), भाषाविज्ञान (1923), हिंदी भाषा और साहित्य (1930) रूपकहस्य (1931), भाषारहस्य भाग 1 (1935), हिंदी के निर्माता भाग 1 और 2 (1940-41), मेरी आत्मकहानी (1941), कबीर ग्रंथावली (1928), साहित्यिक लेख (1945)।
 
श्याम सुंदर दास ने अपना पूरा जीवन हिंदी-सेवा को समर्पित कर दिया। उनके इस तप-यज्ञ से अनेक पुस्तकें साहित्य को प्राप्त हुईं : जैसे नागरी वर्णमाला (1896), हिंदी कोविद रत्नमाला (भाग 1 और 2) (1900), हिंदी हस्तलिखित ग्रंथों का वार्षिक खोज विवरण (1900-05), हिंदी हस्तलिखित ग्रंथों की खोज (1906-08), साहित्य लोचन (1922), भाषा-विज्ञान (1929), हिंदी भाषा का विकास (1924), हस्तलिखित हिंदी ग्रंथों का संक्षिप्त विवरण (1933), गद्य कुसुमावली (1925), भारतेंदु हरिश्चंद्र (1927), हिंदी भाषा और साहित्य (1930), गोस्वामी तुलसीदास (1931), रूपक रहस्य (1913), भाषा रहस्य (भाग-1, 1935), हिंदी गद्य के निर्माता (भाग 1 और 2) (1940) और आत्मकथा मेरी आत्म कहानी (1941)।
 
श्याम सुंदर दास ने सम्पादन के क्षेत्र में तो अद्भुत, अपूर्व प्रतिभा का परिचय दिया : जैसे, नासिकेतोपाख्यान अर्थावली (1901), छत्रप्रकाश (1903), रामचरितमानस (1904), पृथ्वीराज रासो (1904), हिंदी वैज्ञानिक कोष (1906), वनिता विनोद (1906), इंद्रावती (भाग-1, 1906), हम्मीर रासो (1908), शकुंतला नाटक (1908), प्रथम हिंदी साहित्य सम्मेलन की लेखावली (1911), बाल विनोद (1913), हिंदी शब्द सागर (खण्ड- 1 से 4 तक, 1916), मेघदूत (1920), दीनदयाल गिरि ग्रंथावली (1921), परमाल रासो (1921), अशोक की धर्मलिपियाँ (1923), रानीखेत की कहानी (1925), भारतेंदु नाटकावली (1924), कबीर ग्रंथावली (1928), राधाकृष्ण ग्रंथावली (1930), द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ (1933), रत्नाकर (1933), सतसई सप्तक (1933), बाल शब्द सागर (1935), त्रिधारा (1935), नागरी प्रचारिणी पत्रिका (1 से 18 तक), मनोरंजन पुस्तक माला (1 से 50 तक), सरस्वती (1900 तक)।
[[रामचंद्र शुक्ल]] ने हिंदी साहित्य का इतिहास में लिखा है :
 
:"बाबू साहब ने बड़ा भारी काम लेखकों के लिए सामग्री प्रस्तुत करने का किया है। हिंदी पुस्तकों की खोज के विधान द्वारा आपने साहित्य का इतिहास, कवियों के चरित और उन पर प्रबंध आदि लिखने का बहुत बड़ा मसाला इकट्ठा करके रख दिया। इसी प्रकार हिंदी के नये-पुराने लेखकों के जीवनवृत्त हिंदी कोविद रत्नमाला के दो भागों में संगृहीत किये हैं। शिक्षोपयोगी तीन पुस्तकों, भाषा विज्ञान, हिंदी भाषा और साहित्य तथा साहित्य लोचन, भी आपने लिखी या संकलित की है।"
 
श्याम सुंदर दास न केवल संस्थान-निर्माता थे, बल्कि प्रबंध-कला में भी बेजोड़ थे। साहित्य के समस्त क्षेत्रों के अभावों को दूर करने के लिए उन्होंने संकल्पबद्ध होकर श्रम किया। भाषा तत्त्ववेत्ता के रूप में या सिद्धांतों के व्याख्याता रूप में उन्हीं की उपलब्धियों के कारण साहित्यालोचन हिंदी के विद्यार्थियों का बहुत समय तक कंठहार बना रहा। इनके मन में यह धारणा निर्भांत रही कि हिंदी की सैद्धांतिक समीक्षा का आधार संस्कृत और पश्चिमी आलोचना-सिद्धांतों को मिला कर और उन्हें एक ख़ास सामंजस्य के साथ ही बनाया जाना चाहिए। श्याम सुंदर दास से पहले हिंदी और नागरी लिपि के लिए विशेष रूप से संकटपूर्ण समय था। [[प्रताप नारायण मिश्र]] ने कई स्थानों पर हिंदी के प्रचार के लिए सभाएँ स्थापित की थीं। ऐसी ही एक सभा 1884 में ‘हिंदी उद्धारिणी प्रतिनिधि मध्य भारत सभा’ के नाम से प्रयाग में प्रतिष्ठित की गयी। सरकारी दक्रतरों में नागरी के प्रवेश के लिए भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भी कई बार उद्यम किया, पर उन्हें सफलता नहीं मिल सकी। इसके बावजूद प्रयत्न बराबर चलता रहा। अदालती भाषा उर्दू होने के कारण नवशिक्षितों में उर्दू पढ़ने वालों की संख्या अधिक थी, जिससे हिंदी पुस्तकों के प्रकाशन का कार्य आगे नहीं बढ़ पाता था। इस साहित्य-संकट के अतिरिक्त नागरी का प्रवेश सरकारी दक्रतरों में न होने से नागरी जानने वाली जनता के सामने घोर संकट था। इसी दौर में कुछ उत्साही छात्रों के उद्योग से, जिनमें बाबू श्याम सुंदर दास प्रमुख थे, 1893 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना की गयी। यहाँ भी रामचंद्र शुक्ल का कथन याद रखना चाहिए कि, ‘सच पूछिए तो इस सभा की सारी समृद्धि और कीर्ति बाबू श्याम सुंदर दास के त्याग और सतत परिश्रम का फल है। वे आदि से अंत तक इसके प्राणस्वरूप स्थित होकर बराबर इसे अनेक बड़े उद्योगों में तत्पर करते रहे। इसके प्रथम सभापति भारतेंदु के फुफ़ेरे भाई राधाकृष्ण दास हुए।’ नागरी प्रचार के आंदोलन ने हिंदी-प्रेमियों में नया उत्साह पैदा किया और बहुत से लोग साहित्य की श्रीवृद्धि में समर्पित भाव से लग गये।