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'''द्वितीय अध्याय''' के खंडों में नाम और धातु निम्नांकित रूप में हैं। 1. कर्म के 26, 2. अपत्य के 15, 3. मनुष्य के 25, 4. बाहु के 12 5. अंगुलि के 22, 6. इच्छार्थक धातु के 18, 7. अन्न के 28, 8. भोजनार्थक धातु के 10, 9. बल के 28, गो (माता) के नौ, 12. क्रोधवाचक धातु के 10, 13. क्रोध के 11, 14. गत्यर्थक धातु के 122, 15. क्षिप्र (शीघ्र) के 26, 16. आंतिक (निकट) के 11. 19, वधार्थक धातु के 33, 20. बज्र के 18, 21. ऐश्वर्य (उन्नति) वाचक धातु के चार और 22. ईश्वर के चार नाम कहे हैं। इस अध्याय के पदों की संख्या 516 है।
 
'''तृतीय अध्याय''' के खंडों में नाम और धातु इस प्रकार हैं : 1. बहु (अधिक) के 12, 2. ह्रस्व के 11, 3. महत् के 26, 4. गृह के 22, 5. परिचरण (सेवा) वाचक धातु के दस। इन शब्दों के प्रकृति प्रत्यय ज्ञान के पदों की संख्या 279 है। पंचम अध्याय में मुख्य रूप से देवताओं का वर्णन है। इसे दैवतकांड कहते हैं। इसमें छह खंड हैं। इन खंडों में क्रमश: 3, 13, 36, 32, और 31 पद हैं। ये सभी पद देवतावाचक हैं। इस अध्याय की पदसंख्या 151 है। पाँचों अध्यायों के पदों की संख्या का योग 1770 होता है। प्रत्येक अध्याय के अंत में खडों के प्रारंभिक शब्दों का संकलन किया है। इस निघंटु पर यास्क रचित निर्वचन है, जिसका नाम '''[[निरुक्त]]''' है।
 
 
[[श्रेणी:संस्कृत]]
 
 
[[en:Nighantu]]
[[sv:Nighantu]]
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