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मनोविकार विज्ञान इस प्रकार हमारी दृष्टि मानव समाज में प्रचलित जीवन के उन पुराने तरीकों और मूल्यों की ओर फेर देता है, जिनके ह्रास के कारण मनुष्य को अनेक प्रकार के मानसिक क्लेश भोगने पड़ते हैं। इस ज्ञान के सहारे सामाजिक मूल्यों और संस्कृति का जो निर्माण होगा, वह मनुष्य के जीवन को स्थायी स्वास्थ्य प्रदान करेगा। इसी आशा से इस विज्ञान का विस्तार न केवल मानसिक चिकित्सकों द्वारा हो रहा है, वरन् सभी समाज-कल्याण-चिंतकों द्वारा हो रहा है।
 
==भारत में मनोरोगविज्ञान की स्थिति==
[[भारत]] में मनोरोग विज्ञान अभी तक अल्प विकसित अवस्था में है। मनोरोगों के बारे में आम व्यक्ति की जानकारी गलत धारणाओं से भरी है। आज के वैज्ञानिक युग में भी भूत-प्रेत, ऊपरी साया, देवी-देवता, मौसम, नक्षत्र, भाग्य, बुरे कर्मों का फल आदि को इन रोगों का कारण माना जाता है। इसलिए ओझा, पुजारी, मौलवी, साधु, नकली वैद्य, नीम-हकीम, अप्रशिक्षित यौन-विशेषज्ञ इत्यादि अवैज्ञानिक रूप से मनोरोग चिकित्सकों का कार्य कर रहे हैं।
 
सामान्य चिकित्सक एवं चिकित्सा-विशेषज्ञ मनोरोगों को सही समय पर पहचानने तथा रोगियों को मनोरोग चिकित्सक के पास भेजने में प्राय: असमर्थ हैं। इसके कई कारण हैं; जिनके प्रमुख हैं : धन लोलुपता, अपर्याप्त जानकारी, अपर्याप्त प्रशिक्षण, मनोचिकित्सकों की कमी, गरीबी, रोगी या उसके रिश्तेदारों द्वारा मनोरोग को स्वीकार न करना, आदि। समाचार-पत्र तथा अन्य प्रचार-प्रसार माध्यम भी लोगों को मनोरोगों के बारे में सही जानकारी देने में असफल रहे हैं। परिणामस्वरूप लोगों में इन रोगों के बारे में डर व अज्ञानता की गलत धारणाएं दूर नहीं हुई हैं।
 
भारत की 100 करोड़ से अधिक आबादी पर मात्र लगभग 4000 मनोरोग चिकित्सक हैं। यह संख्या बहुत कम है। भारत में 42 मनोरोग के अस्पताल हैं जिनमें लगभग बीस हजार बिस्तर हैं। हाल ही में सभी सरकारी अस्पतालों में मनोरोग चिकित्सा प्रदान करने की योजना बनायी गयी है ताकि मनोरोगियों को सामान्य अस्पतालों में ही चिकित्सा प्रदान की जा सके। परन्तु मनोरोग चिकित्सकों का काफी समय और मनोरोग चिकित्सालयों को मिलने वाली काफी अधिक सहायता नशेड़ियों के उपचार में खर्च हो जाती है।
 
== इन्हें भी देखें ==