"अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ाँ" के अवतरणों में अंतर

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== संक्षिप्त जीवन गाथा ==
 
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ का जन्म [[उत्तर प्रदेश]] के शहीदगढ [[शाहजहाँपुर]] में रेलवे स्टेशन के पास स्थित कदनखैल जलालनगर<ref>डॉ॰ मदनलाल वर्मा 'क्रान्त' ''स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास'' (भाग-दो) पृष्ठ ५३३</ref>मुहल्ले में २२ अक्टूबर १९०० को हुआ था। उनके [[पिता]] का नाम मोहम्मद शफीक उल्ला ख़ाँ था। उनकी [[माँ]] मजहूरुन्निशाँ बेगम बला की खूबसूरत खबातीनों (स्त्रियों) में गिनी जाती थीं।{{cn}}<ref >मजरूह न थी जब तक, दिल ही न था मेरा; सदके तेरे तीरों का 'बिस्मिल' नज़र आता है।</ref >अशफ़ाक़ ने स्वयं अपनी डायरी में लिखा है कि जहाँ एक ओर उनके बाप-दादों के खानदान में एक भी ग्रेजुएट होने तक की तालीम न पा सका वहीं दूसरी ओर उनकी ननिहाल में सभी लोग उच्च शिक्षित थे। उनमें से कई तो डिप्टी कलेक्टर व एस० जे० एम० (सब जुडीशियल मैजिस्ट्रेट) के ओहदों पर मुलाजिम भी रह चुके थे। १८५७ के गदर में उन लोगों (उनके ननिहाल वालों) ने जब [[हिन्दुस्तान]] का साथ नहीं दिया तो जनता ने गुस्से में आकर उनकी आलीशान कोठी को आग के हवाले कर दिया था। वह कोठी आज भी पूरे शहर में '''जली कोठी''' के नाम से मशहूर है। बहरहाल अशफ़ाक़ ने अपनी कुरबानी देकर ननिहाल वालों के नाम पर लगे उस बदनुमा दाग को हमेशा - हमेशा के लिये धो डाला।
 
== बिस्मिल से मुलाकात ==
6,802

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