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"विष को शंकर भगवान के द्वारा पान कर लेने के पश्चात् फिर से समुद्र मंथन प्रारम्भ हुआ। दूसरा रत्न [[कामधेनु]] गाय निकली जिसे ऋषियों ने रख लिया। फिर [[उच्चैःश्रवा]] घोड़ा निकला जिसे दैत्यराज बलि ने रख लिया। उसके बाद [[ऐरावत]] हाथी निकला जिसे देवराज इन्द्र ने ग्रहण किया। ऐरावत के पश्चात् [[कौस्तुभमणि]] समुद्र से निकली उसे विष्णु भगवान ने रख लिया। फिर [[कल्पद्रुम]] निकला और [[रम्भा]] नामक अप्सरा निकली। इन दोनों को देवलोक में रख लिया गया। आगे फिर समु्द्र को मथने से लक्ष्मी जी निकलीं। [[लक्ष्मी]] जी ने स्वयं ही भगवान विष्णु को वर लिया। उसके बाद कन्या के रूप में [[वारुणी]] प्रकट हई जिसे दैत्यों ने ग्रहण किया। फिर एक के पश्चात एक [[चन्द्रमा]], [[पारिजात]] वृक्ष तथा [[शंख]] निकले और अन्त में [[धन्वन्तरि]] वैद्य अमृत का घट लेकर प्रकट हुये।"
धन्वन्तरि के हाथ से [[अमृत]] को दैत्यों ने छीन लिया और उसके लिये आपस में ही लड़ने लगे। देवताओं के पास दुर्वासा के शापवश इतनी शक्ति रही नहीं थी कि वे दैत्यों से लड़कर उस अमृत को ले सकें इसलिये वे निराश खड़े हुये उनका आपस में लड़ना देखते रहे। देवताओं की निराशा को देखकर भगवान विष्णु तत्काल [[मोहिनी]] रूप धारण कर आपस में लड़ते दैत्यों के पास जा पहुँचे। उस विश्वमोहिनी रूप को देखकर दैत्य तथा देवताओं की तो बात ही क्या, स्वयं ब्रह्मज्ञानी, कामदेव को भस्म कर देने वाले, भगवान शंकर भी मोहित होकर उनकी ओर बार-बार देखने लगे। जब दैत्यों ने उस नवयौवना सुन्दरी को अपनी ओर आते हुये देखा तब वे अपना सारा झगड़ा भूल कर उसी सुन्दरी की ओर कामासक्त होकर एकटक देखने लगे।
[[चित्र:Dasavatara2.gifpng|thumb|समुद्र मन्थन|]]
वे दैत्य बोले, "हे सुन्दरी! तुम कौन हो? लगता है कि हमारे झगड़े को देखकर उसका निबटारा करने के लिये ही हम पर कृपा कटाक्ष कर रही हो। आओ शुभगे! तुम्हारा स्वागत है। हमें अपने सुन्दर कर कमलों से यह अमृतपान कराओ।" इस पर विश्वमोहिनी रूपी विष्णु ने कहा, "हे देवताओं और दानवों! आप दोनों ही महर्षि कश्यप जी के पुत्र होने के कारण भाई-भाई हो फिर भी परस्पर लड़ते हो। मैं तो स्वेच्छाचारिणी स्त्री हूँ। बुद्धिमान लोग ऐसी स्त्री पर कभी विश्वास नहीं करते, फिर तुम लोग कैसे मुझ पर विश्वास कर रहे हो? अच्छा यही है कि स्वयं सब मिल कर अमृतपान कर लो।"