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प्राचीन [[वैदिक साहित्य]] की विशाल परंपरा में अंतिम कड़ी [[सूत्र]]ग्रंथ हैं। यह सूत्र साहित्य तीन प्रकार का है: [[श्रौतसूत्र]], गृह्यसूत्र तथा [[धर्मसूत्र]]।
[[वेद]] द्वारा प्रतिपादित विषयों को स्मरणकर उन्हीं के आधार पर आचार-विचार को प्रकाशित करनेवाली शब्दराशि को "स्मृति" कहते हैं। स्मृति से विहित कर्म '''स्मार्त''' कर्म हैं। इन कर्मों की समस्त विधियाँ '''स्मार्त सूत्रों''' से नियंत्रित हैं। स्मार्त सूत्र का नामांतर '''गृह्यसूत्र''' है। अतीत में वेद की अनेक शाखाएँ थीं। प्रत्येक शाखा के निमित्त गृह्यसूत्र भी होंगे। वर्तमानकाल में जो गृह्यूत्र उपलब्ध हैं वे अपनी शाखा के कर्मकांड को प्रतिपादित करते हैं।
 
[[वेद]] द्वारा प्रतिपादित विषयों को स्मरणकरस्मरण कर उन्हीं के आधार पर आचार-विचार को प्रकाशित करनेवाली शब्दराशि को "स्मृति" कहते हैं। स्मृति से विहित कर्म '''स्मार्त''' कर्म हैं। इन कर्मों की समस्त विधियाँ '''स्मार्त सूत्रों''' से नियंत्रित हैं। स्मार्त सूत्र का नामांतर '''गृह्यसूत्र''' है। अतीत में वेद की अनेक शाखाएँ थीं। प्रत्येक शाखा के निमित्त गृह्यसूत्र भी होंगे। वर्तमानकाल में जो गृह्यूत्र उपलब्ध हैं वे अपनी शाखा के कर्मकांड को प्रतिपादित करते हैं।
 
== काल ==
अधिकांश प्रमुख सूत्रग्रंथों की रचना [[महात्मा बुद्ध|गौतम बुद्ध]] के समकालिक युग में हुई जान पड़ती है, विद्वानों ने उनके पूर्ण विकास का समय 8वीं सदी ई. पू. और तीसरी सदी ई. पू. के बीच माना है।
 
== परिचय ==
 
कोशिकागृह्यसूत्र का संबंध [[अथर्ववेद]] से है। ये सब गृह्यसूत्र विभिन्न स्थलों से प्रकाशित हैं।
 
== वर्ण्य विषय ==
श्रौतसूत्रों के वर्ण्य विषय यज्ञों के विधि-विधान और धार्मिक प्रक्रियाओं से संबंधित हैं। साधारण समाज के लिए उनका विशेष महत्व न था। गृह्य और धर्मसूत्रों की रचना का उद्देश्य सामाजिक, पारिवारिक, राजनीतिक और विधि संबंधी नियमों का निरूपण है। तत्संबंधी प्राचीन भारतीय अवस्थाओं की जानकारी में उनका बहुत बड़ा ऐतिहासिक मूल्य है। गृह्यसूत्रों में मुख्य हैं: कात्यायन, आपस्तंब, बौधायन, गोभिल, खादिर और शांखायन। इनके अलग अलग सिद्धांत संप्रदाय थे परंतु कभी-कभी उन सबमें वर्णित नियम समान हैं। संभव हैं, उनके भेद स्थानीय और भौगोलिक कारणों से रहे हों और इस दृष्टि उन्हें समसामयिक भारत के अन्यान्य प्रदेशों का प्रतिनिधि माना जा सकता है। गृह्यसूत्र श्रौत (अपौरूषेय अथवा ब्रह्म) नहीं माने जाते बल्कि स्मार्त समझे जाते हैं और वे पारिवारिक तथा सामाजिक नियमों की परंपरा को व्यक्त करते हैं। गृह्य सूत्रों में पारिवारिक जीवन से संबंधित संस्कारों का विवेचन है और वे कैसे किए जाने चाहिए, इसके पूर्ण विधि विधान दिए गए हैं। गर्भाधान से आरंभ कर अंत्येष्टि तक [[सोलह संस्कार|सोलह संस्कारों]] का विधान गृह्यसूत्रों के युग से ही अपने पूर्ण विकसित रूप में भारतीय जीवन का अंग बन गया तथा उन संस्कारों की धार्मिक और दार्शनिक भावनाओं का विकास हुआ। आज भी ये संस्कार, जिनमें मुख्य जातकर्म उपनयन, विवाह और अंत्येष्टि (श्राद्धसहित) माने जा सकते हैं, हिंदू जीवन में बड़ा स्थान रखते हैं। पर इन संस्कार व्यवस्थाओं के साथ ही गृह्यसूत्रों में कभी अंधविश्वासों को भी शामिल कर लिया गया है गृहस्थ जीवन से संबंधित कुछ अन्य धार्मिक कर्तव्यों की भी उनमें चर्चा है।
 
==इन्हें भी देखें==
*[[धर्मसूत्र]]
*[[श्रौतसूत्र]]
*[[शुल्बसूत्र]]
 
== बाहरी कड़ियाँ ==
* [http://hinduism.iskcon.com/tradition/1204.htm Description of smarta tradition.]
 
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]
[[श्रेणी:वेद]]
[[श्रेणी:संस्कृत]]
[[श्रेणी:साहित्य]]
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]
[[श्रेणी:स्मृति]]