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: व्योम्नो झगित्याभरणत्वमेति सन्तप्तगर्जद्ररसरागशक्त्या॥ ९८
 
समरांगण सूत्रधार का ३१वाँ अध्याय यंत्रविज्ञान के क्षेत्र में एक सीमा बिन्दु है। इस अध्याय में अनेक यंत्रों का वर्णन है। लकड़ी के वायुयान, यांत्रिक दरबान तथा सिपाही, इनमें [[रोबोट]] की एक झलक देख सकते हैं।
===यांत्रिकी===
समरांगणसूत्रधार के ३१वें अध्याय में यन्त्रों की क्रियाओं का वर्णन निम्न प्रकार है-
*(४) कुछ यंत्र विशिष्ट क्रियाओं के लिए या वस्तुओं का आकार बड़ा या छोटा करना, आकार बदलने या धार चढाने के लिए होते हैं,
 
किसी भी यंत्र के मुख्य गुण क्या-क्या होने चाहिए, इसका वर्णन समरांगण सूत्रधार में करते हुए पुर्जों के परस्पर सम्बंध, चलने में सहजता, चलते समय विशेष ध्यान न देना पड़े, चलने में कम ऊर्जा का लगना, चलते समय ज्यादा आवाज न करें, पुर्जे ढीले न हों, गति कम-ज्यादा न हो, विविध कामों में समय संयोजन निर्दोष हो तथा लंबे समय तक काम करना आदि प्रमुख २० गुणों की चर्चा करते हुए ग्रंथ में कहा गया है-
इस ग्रंथ में अच्छे, कार्यकुशल यंत्रो के गुण निम्न प्रकार वर्णित हैं-
: यथावद्वीजसंयोगः सौश्लिष्यं श्लक्ष्णतापि च।
: अलक्षता निर्वहणं,लघुत्वं शब्दहीनता॥
: शब्दे साध्ये तदाधिक्यं,अशैथिल्यं अगाढता।
: बहनीषु समस्तासु सौस्लिष्ट्यं चास्सलद्गतिः॥
: यथामिष्टार्यकारित्वं लयतालानुयमिता।
: इष्टकालेर्थदर्शित्वं,पुनः सम्यक्त्व संवृत्तिः॥
 
: यन्त्राणामाकृतिस्तेन निर्णेतुं शक्यते ।
अर्थत्
: यथावद्बीजसंयोगः सौश्लिष्ट्यं श्लक्ष्णतापि च ॥
: अलक्षता निर्वहणं, लघुत्वं शब्दहीनता॥शब्दहीनता ।
: शब्दे साध्ये तदाधिक्यमशैथिल्यमगाढता ॥
: वहनीषु समस्तासु सौश्लिष्ट्यं चास्खलद्रति ।
: यताभीष्टार्थकारित्वं लयतालानुगामिता ॥
: इष्टकालेऽर्थदर्शित्वं पुनः सम्यक्त्वसंवृतिः ।
: अनुल्बणत्वं ताद्रूप्यं दाढर्येमसृणता तथा ॥
: चिरकालसहत्वं च यन्त्रस्यैते गुणः स्मृताः ।
 
अर्थात्
 
(१) समयानुसार स्वसंचालन के लिए यंत्र से शक्ति-निर्माण होता रहना चाहिए।
 
(२) यंत्रों की विविध क्रियाओं मे संतुलन एवं सहकार हो।
 
(३) सरलता से , मृदुलता से चले।
 
(४) यंत्रो को बार-बार निगरानी की आवश्यकता न पड़े।
 
(५) बिना रूकावट के चलता रहे।
 
(६) जहाँ तक हो सके यांत्रिक क्रियाओ मे जोर दबाब नहीं पडना चाहिए।
 
(७) आवाज न हो तो अच्छा, हो तो धीमी।
 
(८) यंत्र से सावधानता की ध्यानाकर्षण की ध्वनि निकलनी चाहिए।
 
(९) यंत्र ढीला, लडखडाता या कांपता न हो।
 
(१०) अचानक बंद या रूकना नहीं चाहिए
 
(११) उसके पट्टे या पुर्जो का यंत्र के साथ गहरा संबंध हो।
 
(१२) यंत्र की कार्यप्रणाली मे बांधा नही आनी चाहिए।
 
(१३) उससे उद्देश्य की पूर्ति होनी चाहिए।
 
(१४) वस्तु उत्पादन मे आवश्यक परिवर्तन आदि यांत्रिक क्रिया अपने आप होती रहनी चाहिए।
 
(१५) यंत्र क्रिया सुनिश्चित क्रम में हो।
 
(१६) एक क्रिया का दौर पूर्ण होते ही यंत्र मूल स्थिति पर यानी आरम्भ की दशा पर लौट जाना चाहिए।
 
(१७) क्रियाशीलता मे यंत्र का आकार ज्यों का त्यों रहना चाहिए।
 
(१८) यंत्र शक्तिमान हो।
 
(१९) उसकी कार्यविधि सरल और लचीली हो
 
(२०) यंत्र दीर्घायु होना चाहिए।
 
विविध कार्यों की आवश्यकतानुसार विविध [[गति|गतियाँ]] होतीं हैं जिससे कार्यसिद्धि होती है।
: (१) तिर्यग्‌- slanting (२) ऊर्ध्व upwards (३) अध:- downwards (४) पृष्ठे- backwards (५) पुरत:-forward (६) पार्श्वयो:- sideways
 
समरांगणसूत्रधार के इस श्लोक में इसी का वर्णन है।
: तिर्यगूर्ध्वंमध: पृष्ठे पुरत: पार्श्वयोरपि।
: गमनं सरणं पात इति भेदा: क्रियोद्भवा:॥ (समरांगणसूत्रधार, अध्याय ३१)
 
===तरलयांत्रिकी===
हाइड्रोलिक मशीन (Turbine)-जलधारा के शक्ति उत्पादन में उपयोग के संदर्भ में ‘समरांगण सूत्रधार‘ ग्रंथ के ३१वें अध्याय में कहा है-
 
:धारा च जलभारश्च पयसो भ्रमणं तथा॥
:यथोच्छ्रायो यथाधिक्यं यथा नीरंध्रतापि च।
:एवमादीनि भूजस्य जलजानि प्रचक्षते॥
 
बहती हुई जलधारा का भार तथा वेग का शक्ति उत्पादन हेतु हाइड्रोलिक मशीन में उपयोग किया जाता है। जलधारा वस्तु को घुमाती है और ऊंचाई से धारा गिरे तो उसका प्रभाव बहुत होता है और उसके भार व वेग के अनुपात में धूमती है। इससे शक्ति उत्पन्न होती है।
 
:सङ्गृहीतश्च दत्तश्च पूरित: प्रतनोदित:।
:मरुद्‌ बीजत्वमायाति यंत्रेषु जलजन्मसु॥ समरांगण-३१
 
पानी को संग्रहित किया जाए, उसे प्रभावित और पुन: क्रिया हेतु उपयोग किया जाए, यह मार्ग है जिससे बल का शक्ति के रूप में उपयोग किया जाता है। इसकी प्रक्रिया का विस्तार से इसी अध्याय में वर्णन है।
 
==संरचना==