"भक्ति": अवतरणों में अंतर

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'''भक्ति''' भजन है। किसका भजन? ब्रह्म का, महान का। महान वह है जो चेतना के स्तरों में मूर्धन्य है, यज्ञियों में यज्ञिय है, पूजनीयों में पूजनीय है, सात्वतों, सत्वसंपन्नों में शिरोमणि है और एक होता हुआ भी अनेक का शासक, कर्मफलप्रदाता तथा भक्तों की आवश्यकताओं को पूर्ण करनेवाला है।
भक्ति कोई कर्मकांड अथवा टोटके करना नहीं बल्कि चित्त की एक अवस्था हैं जिसमें भगत का प्रेम अपने अराध्य पर होता हैं चाहे वह किसी भी धर्म का हो।
श्रीमद्भागवत पुराण में एकादश स्कन्ध में भागवत धर्म का वर्णन हैं।जिसमे भक्ति के विभिन्न स्तरों का वर्णन न्व्योगिश्वर द्वारा किया गया हैं।
 
== परिचय ==
 
== बाहरी कड़ियाँ ==
* [http://rachanakar.blogspot.com/2009/10/blog-post_1347.html प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन का आलेख : मध्य युगीन संतों का निर्गुण-भक्ति-काव्य : कुछ प्रश्न ]
 
[[श्रेणी:शब्दार्थ]]