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(तपोनिष्ठ अरविन्द घोष की कारावास कहानी का प्रकाशन सन्दर्भ दिया)
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रामप्रसाद जी की सारी हसरतें दिल-ही-दिल में रह गयीं। आपने एक लम्बा-चौड़ा ऐलान किया है जिसे संक्षेप में हम दूसरी जगह दे रहे हैं। फाँसी से दो दिन पहले सी.आई.डी. के डिप्टी एस.पी. और सेशन जज मि. हैमिल्टन आपसे मिन्नतें करते रहे कि आप मौखिक रूप से सब बातें बता दो। आपको पन्द्रह हजार रुपया नकद दिया जायेगा और सरकारी खर्चे पर विलायत भेजकर बैरिस्टर की पढ़ाई करवाई जायेगी। लेकिन आप कब इन सब बातों की परवाह करते थे। आप तो हुकूमतों को ठुकराने वाले व कभी-कभार जन्म लेने वालों में से थे। मुकदमे के दिनों आपसे जज ने पूछा था - 'आपके पास कौन सी डिग्री है?' तो आपने हँसकर जवाब दिया था - 'सम्राट बनाने वालों को डिग्री की कोई जरूरत नहीं होती, क्लाइव के पास भी तो कोई डिग्री नहीं थी।' आज वह वीर हमारे बीच नहीं है, आह!"<ref>[http://books.google.co.in/books?id=w5LliYQaQgwC&pg=PA86 भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज़], जगमोहन सिंह और चमनलाल, [[गूगल बुक]] पृष्ठ ८६-८७ </ref>
== अस्थि-कलश की स्थापना ==
बिस्मिल की अन्त्येष्टि के बाद बाबा राघव दास ने गोरखपुर के पास स्थित [[देवरिया]] जिले के बरहज नामक स्थान पर ताम्रपात्र में उनकी अस्थियों को संचित कर एक चबूतरा जैसा स्मृति-स्थल बनवा दिया। <ref > अरविन्द 'पथिक', [[2006]], बिस्मिल चरित, सापेक्ष प्रकाशन, [[गाजियाबाद]], ISBN: 81-903186-3-8, पृष्ठ: 131</ref >
 
== फाँसी के बाद क्रान्तिकारी आन्दोलन में तेज़ी ==
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