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"मानवाधिकारों" को लेकर अक्सर विवाद बना रहता है। ये समझ पाना मुश्किल हो जाता है कि क्या वाकई में मानवाधिकारों की सार्थकता है। यह कितना दुर्भाग्यपू्‌र्ण है कि तमाम प्रादेशिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरकारी और गैर सरकारी मानवाधिकार संगठनों के बावजूद मानवाधिकारों का परिदृश्य तमाम तरह की विसंगतियों और विद्रूपताओं से भरा पड़ा है। किसी भी इंसान की जिंदगी, आजादी, बराबरी और सम्मान का अधिकार है मानवाधिकार है। भारतीय संविधान इस अधिकार की न सिर्फ गारंटी देता है, बल्कि इसे तोड़ने वाले को अदालत सजा देती है।
 
'''भारत में मानव अधिकार विचारधारा का विकास'''
== दर्शन ==
 
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मानव अधिकार विचारधारा के विकास का क्रम भारत में आज से लगभग ९००० वर्ष (७३२३ ईसा पूर्व) पहले शुरू हुआ माना जाता है भारत के राज्य अयोध्या, प्राचीन काल में इसे कौशल देश कहा जाता था, के राजा रामचंद्र नें रावण और अन्य आततायी राजाओं का संहार कर रामराज्य की स्थापना की एवं द्वारका जोकि भारत के पश्चिम में समुद्र के किनारे पर बसी है, हजारों वर्ष पूर्व श्री कॄष्ण ने इसे बसाया था कृष्ण मथुरा में उत्पन्न हुए, गोकुल में पले, पर उन्होने द्वारका में ही बैठकर सारे देश की बागडोर अपने हाथ में संभाली। कंस शिशुपाल और दुर्योधन जैसे आततायी अधर्मी राजाओं को नष्ट कर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की एवं नागरिकों के अधिकार उन्हें दिलाया । भगवान महावीर ( ५९९ ईसा पूर्व से २२७ ईसा पूर्व ) एवं भगवान बुद्ध ५६३ ईसा पूर्व के कालखंड में अधिकारों के अवधारणा की रचना की जिसमें सत्य, अहिंसा और समता मुख्य थे ।
इसी तरह यूनान में ( ४६९ से ३९९ ईसा पूर्व ) विख्यात दार्शनिक सुकरात का नाम आता है । सुकरात नें अपने अनुयाइयों को आत्मानुसंधान के बारे में तथा सत्य न्याय एवं इमानदारी का अवलंबन करने के बारे में बताया । हालाँकि तत्कालीन यूनानी शासकों नें सुकरात के उपदेशों पर प्रतिबन्ध लगाने का प्रयास किया पर सफल न होने पर उन्होंने सुकरात को विषपान कर अपनी इहलीला समाप्त करने का आदेश दिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस प्रबल पैरोकार नें विषपान कर अपनी इहलीला तो समाप्त कर ली किन्तु अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आंच नहीं पहुचने दी इसके बाद सुकरात का शिष्य प्लेटो (४२८ ईसा पूर्व से ४२७ ईसा पूर्व ) प्लेटो का शिष्य अरस्तु (३८४ ईसा पूर्व से ३२२ ईसा पूर्व ) इन महान यूनानी दार्शनिकों नें तमाम मानवीय अधिकारों की व्याख्या की ।
इधर भारत में आगे चलकर सम्राट अशोक नें भगवान बुद्ध और भगवान महावीर के (धार्मिक) अवधारणाओं को लेकर उसे राजनीतिक रूप दिया और यह सब सम्राट अशोक नें कलिंग की लडाई के पश्चात् उसमे हुए नरसंहार से दुखी होकर मानव गरिमा को अच्छुण बनाये रखने के प्रयास के तहत किया । सम्राट अशोक का कार्यकाल ईसा पूर्व २७३ से २३२ तक बताया जाता है इसके पश्चात् मानवीय अधिकारों को केंद्रविन्दु मानकर विश्व में तमाम क्रांतियाँ हुई जिसमें १२१५ ईसवी में मैग्नाकार्टा, १७९१ अमेरिकी बिल ऑफ राइट्स, तथा मानव अधिकारों को व्यापक गरिमा फ्रांसीसी क्रांति (१७८९ ) के पश्चात प्राप्त हुई । अमेरिका में जाँ जैक के संविदा सिद्धांत से प्रेरित क्रांति के समय संविधान सभा नें यह घोषणा की थी कि अमेरिकी संविधान निर्मित होने पर सबसे पहले मानव अधिकारों का उल्लेख किया जाएगा यह घोषणा वास्तव में जार्ज वाशिंगटन के नेतृत्व में संयुक्त राज्य अमेरिका के स्वतंत्रता की घोषणा ( सन १७७८ ई०) के सिद्धांतों से प्रेरित थी ।
इसमें कोई दो राय नही कि भारत के आजादी की लडाई मानवीय अधिकारों के मूल्यों पर लड़ी गई । महात्मा गांधी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता के रूप में उभरे वे सत्याग्रह, अत्याचार के प्रतिकार एवं अहिंसा ( उन्होंने ये सभी अवधारणाए महावीर और बुद्ध के (धार्मिक) अवधारणाओं से उठाया ) और इसी का आजादी की लडाई में हथियार के रूप में इस्तेमाल किया तत्कालीन भारतीयों के दिलों-दिमाग पर छा गये सत्याग्रह, अत्याचार के प्रतिकार एवं अहिंसा रूपी हथियार इतनें कारगर साबित हुए कि आज भी समूची दुनिया महात्मा गांधी के इस प्रयोग का लोहा मानती है । देश के आजाद होनें के पश्चात सम्राट अशोक से प्रभावित हमारे तत्कालीन नेतागण भारतीय संविधान में भगवान बुद्ध और भगवान महावीर एवं सम्राट अशोक के अवधारणाओं को मौलिक अधिकारों के रूप में शामिल किया इतना ही नहीं हमारे देश के तत्कालीन नेतागण दो कदम और आगे जाकर अशोक चक्र को राष्ट्रीय चिन्ह एवं अशोक स्तम्भ को राष्ट्रीय मुद्रा चिन्ह के रूप में स्वीकृत किया ।
जानकारों के मुताबिक तमाम देशों के संविधान में भगवान बुद्ध और भगवान महावीर एवं सम्राट अशोक के अवधारणाओं एवं मूल्यों को शामिल किया गया है । इतना ही नहीं हर विषय पर पश्चिमी देशों की तरफ देखने वालों और तमाम मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को शायद ही यह पता हो कि संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना २४ अक्टूबर १९४५ को हुई थी उसका मूल भगवान बुद्ध और भगवान महावीर एवं सम्राट अशोक की अवधारणाए एवं मूल्य ही है । जब हम मानवीय अधिकारों के अवधारणा के विकास का गहराई से अध्ययन करते है तब हमें मानव अधिकारों के विकास में प्राचीन भारत के राजा रामचंद्र, राजा कृष्ण, भगवान बुद्ध, भगवान महावीर एवं सम्राट अशोक से लेकर महात्मा गांधी के योगदान की अद्वितीय गाथा का पता चलता है किन्तु शायद इस बात से अनजान या जानते हुए कि पुरी दुनिया भारतीय महापुरुषों द्वारा निर्मित मानवीय अधिकारों के अवधारणाओं एवं मूल्यों को स्वीकार्य एवं अंगीकृत किया है । भारत सरकार नें संयुक्त राष्ट्रसंघ के दबाव में आकर मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम १९९३ तो संसद में किसी तरह पास कर दिया किन्तु सरकार मानव अधिकारों की गरिमा को अच्छुण बनाये रखने के प्रति कितनी उदासीन है, दिखाई देता है ।
भारत देश जिसका संविधान समतावाद के सिद्धांत पर आधारित है, आज उस परिमाण में असमानतावाद का गवाह है जो औपनिवेशिक शासन के दौरान भी नहीं देखी गई। आज जो देश विश्व के अरबपतियों की सूची में चौथे स्थान पर है, मानव विकास के मामले में वही 126वें स्थान पर है।
ऐसा माना जा रहा था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विकास का चक्का तेजी से घूमने लगेगा और सभी को समान अवसर प्राप्त हो सकेंगे, जिससे संतुलित विकास का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा। लेकिन इस तरह की विषमता आज क्यों देखने को मिल रही है, इस बात को लेकर विचार करने का समय आ गया है।
हमारे मानवाधिकार
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1. मानवाधिकार की सुरक्षा के बिना सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आज़ादी खोखली है| मानवाधिकार की लड़ाई हम सभी की लड़ाई है|
2. विश्वभर मैं नस्ल, धर्म, जाति के नाम मानव द्वारा मानव का शोषण हो रहा है| अत्याचार एवम जुल्म के पहाड़ तोड़े जा रहे हैं|
3. हमारे देश में स्वतंत्रता के पश्चात् धर्म एवम जाति के नाम पर भारतवासियों को विभाजित करने का प्रयास किया जा रहा है|
4. आदमी गौर हो या काला, हिन्दू हो या मुस्लमान, सिख हो या ईसाई, हिंदी बोले या कोई अन्य भाषा सभी केवल इंसान हैं और संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित मानवाधिकारों को प्राप्त करने का अधिकार है|
5. मानव अधिकार का मतलब ऐसे हक़ जो हमारे जीवन और मान-सम्मान से जुड़े हैं|
6. ये हक़ हमें जन्म से मिलते हैं, हम सब आज़ाद हैं|
7. साफ़ सुथरे माहौल मैं रहना हमारा हक़ है |
8. हमें इलाज़ की अच्छी सहूलियत मिले|
9. हमें और हमारे बच्चों को पढाई-लिखाई की अच्छी सहूलियत मिले|
10. पीने का पानी साफ मिले|
11. जाति, धर्म, भाषा-बोली के कारण हमारे साथ भेदभाव न हो|
12. हमें हक़ है की हम सम्मान के साथ रहें|
13. कोई हमें अपना दस या गुलाम नहीं बना सके|
14. प्रदेश में हम कहीं भी बेरोकटोक आना-जाना कर सकते हैं|
15. हम बेरोकटोक बोल सकते हैं, लेकिन हमारे बोलने से किसी के मान-सम्मान को चोट नहीं पहुंचनी चाहिए|
16. हमें आराम करने का अधिकार है|
17. हमें यह तय करने का अधिकार है की हमारे बच्चे को किस तरह की शिक्षा मिले|
18. हर बच्चे को जीने का अधिकार है, उसे अच्छी तरह की शिक्षा मिले|
19. यदि हमें हमारा हक़ दिलाने मैं सरकारी महकमा हमारी मदद नहीं कर रहा है तो हम मानव अधिकार आयोग में शिकायत कर सकते हैं|
20. आयोग में सीधे अर्जी देकर शिकायत कर सकते हैं|
21. इसके लिए वकील की जरूरत नहीं है|
22. शिकायत किसी भी भाषा या बोली में कर सकते हैं हिंदी में हो तो अच्छा है|
23. शिकायत लिखने के लिए कैसे भी कागज़ का इस्तेमाल करें, स्टैम्प पेपर की कोई जरूरत नहीं होती|
24. आयोग के दफ्तर में टेलीफोन नम्बर पर भी शिकायत दर्ज कर सकते हैं|
 
मानव अधिकार एक समस्या
पश्चिम एशिया, अफ्रीका और यूरोप की सभी प्राचीन सभ्यताओं में मानव समाज के कलंक 'दासता' (slavery) की भयावह प्रथा प्रचलित थी। विशेष रीति से जो साम्राज्य एवं सभ्यताएँ तलवार के बल से कायम हुईं, टिकीं और बड़ी बनीं, उनमें इस अत्याचारी प्रथा का नंगा नाच देखा जा सकता है। दासों (गुलामों) के व्यापक शोषण एवं उत्पीड़न से, उनके पसीने एवं रक्त से, कम-अधिक मात्रा में सने हैं इन सभ्यताओं के रंगमहल। उसी से बनी पश्चिमी जीवन की इमारत। अरब और मुसलिम जगत, यूनान, रोम, भूमध्य सागर के चारों ओर के अन्य देशों में और अंत में यूरोपीय देशों की उपनिवेश तथा साम्राज्य-लिप्सा द्वारा पश्चिमी एशिया, यूरोप, अफ्रीका और उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका में इस घोर गर्हित प्रथा की काली घटा छाई।
 
 
कबीलों का सादा जीवन (जैसा आस्ट्रेलिया और अमेरिका के आदिम निवासियों में पाया गया) दास प्रथा से अपरिचित था। पर पश्चिमी सभ्यता में संघर्ष तथा युद्घ आया और तज्जनित कृषि एवं उद्योंगों में श्रमिकों की आवश्यकता। तब युद्घबंदियों का मजदूर के रूप में उपयोग प्रारंभ हुआ। संभवतया उसी में इस निंदनीय प्रथा का जन्म उस समाज में हुआ जहाँ बर्बर अवस्था से उबरना न हो सका था, न सामाजिक जीवन-दर्शन उत्पन्न हुआ, न मानव-मूल्यों की कल्पना आई।
 
 
दास पाने का प्रमुख स्त्रोत युद्घबंदी थे। इसके अतिरिक्त दीन माता-पिता कभी नितांत विपत्ति अथवा संकट में अपनी संतान को, या ऋण चुका सकने में असमर्थ व्यक्ति अपने को दास के रूप में उपस्थित करता था। दासों का क्रय-विक्रय यूनान, साइप्रस, रोम, अरब और पश्चि के बाजारों में साधारण घटना थी। यहाँ एशियाई, अफ्रीकी तथा यूरोपीय दासों का सौदा होता था। यूनान में दास बहुत बड़ा संख्या में थे। कहते हैं, अकेले एथेंस में उनकी संख्या स्वतंत्र नागरिकों से अधिक थी। होमर के महाकाव्य 'इलियड' तथा 'ओडेसी' में उनका वर्णन आता है।
 
 
रोम साम्राज्य का प्रारंभ तथा प्रसार सैन्य बल पर हुआ था। वहाँ दास प्रथा पराकाष्ठा पर पहुँची। इस प्रथा के नियम रोमन विधि के विशिष्ट अंग थे। जिस कार्थेज (Carthage) को फणीशियों ( Phoenicians) (संभवतया यह पुराणों में वर्णित पणि या नाग जाति है) ने उत्तरी अफ्रीका के सुरक्षित तट पर विक्रम पूर्व नौवीं-आठवीं शताब्दी में बसाया, उसके साथ युद्घ-श्रंखला के चलते रोम में श्रमिकों की कमी हो गई। तब युद्घबंदियों से दासों की भाँति काम करवाने से यह प्रथा निर्ममता के शिखर छूने लगी। कहते हैं, उस समय कुछ प्रमुख बाजारों में दस हजार दासों का प्रतिदिन सौदा होता था। मनोरंजन के लिए भी दासों को शस्त्रों से अथवा कठघरे में रखे बए हिंस्र पशु से युद्घ करना पड़ता था, जिनमें घायल होना एवं मृत्यु साधारण बात थी।
 
 
ऎसी दशा में विक्रम संवत् पूर्व प्रथम शताब्दी में रोम के विरूद्घ दास-विद्रोह प्रारंभ हुए। एक समय दक्षिण इटली दासों के हाथ में चला गया। इधर साम्राज्य का विस्तार और उसके लिए युद्घ बंद हो गए। तब दासों का मिलना कम हो गया। रोमन साम्राज्य के पतन का प्रमुख कारण यह दास प्रथा कही जाती है। दास का अपने उत्पीड़न के आधार पर खड़ी व्यवस्था से कोई लगाव न था। रोमन साम्राज्य के समाप्त होते ही दास प्राप्त करने के लिए छापे तथा आक्रमण कम हो गए और दास प्रथा में कमी आई।
 
 
पर यूरोप में यह दास प्रथा चौदहवीं शताब्दी तक सामान्यतया चलती रही। अब दास अधिकांशत: 'स्लाव' (Slav); देश से मिलते थे। इसी से अंग्रेजी में दासता के लिए 'स्लेवरी' शब्द प्रयोग होता है। चौदहवीं शताब्दी के समीप पश्चिमी एशिया तथा पूर्वी यूरोप में पुन: युद्घ की छाया मँडराई। इसके कारण पश्चिमी यूरोप को युद्घबंदी दास के रूप में प्राप्त होने लगे। ये बंदी 'यीशु के शत्रु' समझे जाते थे और निरंकुश अत्याचारों के शिकार बनते। पादरियों की सेवा के लिए गिरनाघर में जो दास रखे जाते थे उनकी सबसे बदतर दुर्दशा थी। अरब देश तो सदा से अफ्रीकी दासों का व्यापार करते थे। पैगंबर ने गुलामों के साथ सहृदयता दिखाने की सलाह दी। पर व्यवहार में घोर कट्टरपन ने उलटा उन्हें नारकीय जीवन बिताने पर विवश किया। अरब का यह इसलामी कालखंड अधिकांशत: युद्घ की भट्ठी में जलता रहा। उनके साम्राज्य-प्रसार ने दासता को हवा दी। दास व्यापार पुन: बड़ी मात्रा में चालू हुआ।
 
 
जब यूरोप निवासियों का औपनिवेशिक युग प्रारंभ हुआ तब दास प्रथा में और बढ़ोत्तरी हो गई। पुर्तगाली अफ्रीकी दासों के व्यापार में अरबों से लोहा लेने लगे। नई दुनिया की खोज के बाद पश्चिमी द्वीप समूह, मेक्सिको और मेक्सिको की खाड़ी के क्षेत्र तथा पूर्व-उत्तरी अमेरिका का पूर्व-दक्षिण तट, पूरू, ब्राजील तथा अन्य देशों में यूरोपवासियों ने बड़े-बड़े क्षेत्र अपने कब्जे में कर लिये। वहाँ गन्ना, कपास, तंबाकू आदि और खाद्यान्नों की विस्तृत खेती के लिए श्रमिक चाहिए थे। उसकी पूर्ति पहले छापा मारकर वहाँ के आदिम निवासियों को दास बनाकर की, जिनको उनके खेतों से अथवा प्रदेश से निकाल दिया; उनके स्त्री-बच्चों को बाजारों में बेचा। अनेक आदिम जातियों का नाम इस प्रक्रिया में मिट गया। इन ईसाई 'सभ्य' लोगों के लिए इन 'धर्मभ्रष्ट' लोगों को 'सच्चा धर्म' दिखाने का एकमेव मार्ग इन्हें दास बनाना था। यूरोप निवासियों के अत्याचारों की कहानी अमेरिकी मूल जातियों के ह्रास तथा समूल वंश-नाश ने लिखी है।
 
 
सोलहवीं शताब्दी में अफ्रीकी दासों का अमेरिका में आयात प्रारंभ हुआ। इन हब्शियों को जहाजों में जानवरों की तरह ठूसकर समुद्र पार अमेरिका ले जाया जाता था। वहाँ उन्हें बेचकर वस्तुएँ और सोने से लदे जहाज यूरोत आते। मानव का क्रय ही यूरोप और अमेरिका की लौकिक समृद्घि की कहानी है। परंतु इससे इस भयानक अत्याचार का पूरा व्याप प्रकट नहीं होता। दासों के आवास से घुड़साल अच्छी; उनका आधा पेट भोजन और काम के समय पूरी टोली पर गोरे पर्यवेक्षक के कोड़े! दास प्रथा का दु:ख-दर्द तो आंशिक रूप से श्रीमती हैरियट स्टोई की पुस्तक 'टाम काका की कुटिया' ('Uncle Tom's Cabin': Harriet Beecher Stowe) पढ़कर समझ सकते हैं। कहते हैं कि इसी पुस्तक के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका का गृहयुद्घ हुआ। अब्राहम लिंकन ने (जो उस समय वहाँ के राज्याध्यक्ष थे) कहा, 'यदि दास प्रथा पाप नहीं है तो संसार में कुछ भी पाप नहीं।' फ्रांस की राज्यक्रांति के नारों के कारण भी यूरोप का वातावरण बदल रहा था। ऎसे समय में भीषण गृहयुद्घ में वह देश संयुक्त बच सका।
 
 
पर यूरोपीय साम्राज्यवाद दास प्रथा के नए रूप लेकर आया। भारत से बड़ी मात्रा में अनुबंध के अंतर्गत गिरमिटिया कहकर श्रमिकों को अनेक प्रकार के लालच दे, प्रशांत तथा हिंद महासागर के द्वीपों में और अफ्रीका में भेजना प्रारंभ हुआ। वहाँ उनके कोई अधिकार न थे। वे केवल उन अधिकारों का उपभोग कर सकते थे जो उनके स्वामी उन्हें देते थे। उनके रीति-रिवाज, यहाँ तक कि भारत में हुआ विवाह भी अमान्य था। पति पत्नी से, भाई भाई से, माता-पिता संतानों से अलग, करार के अंतर्गत स्वामी की इच्छानुसार रखे जा सकते थे। वेतन जब चाहा, फर्जी त्रुटि दिखाकर काटा जा सकता था। अपनी मातृभूमि से दूर गुलाम देश के इन निवासियों की दशा 'दास' के समान थी। तब वैसी ही एक नाटक की पुस्तक 'कुली प्रथा अथवा बीसवीं सदी की गुलामी' आई। यह पुस्तक हिंदी की प्रसिद्घ कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान के पति श्री लक्ष्मणसिंह चौहान ने लिखी थी। प्रकाशित होने के कुछ दिन बाद वह जब्त हो गई। पर यह 'गिरमिटिया' नामक कुली प्रथा प्रथम महायुद्घ के समीप बंद हो गई।
 
मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा
 
10 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ की समान्य सभा ने मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा को स्वीकृत और घोषित किया । इसका पूर्ण पाठ आगे के पृष्ठों में दिया गया है । इस ऐतिहासिक कार्य के बाद ही सभा ने सभी सदस्य देशों से पुनरावेदन किया कि वे इस घोषणा का प्रचार करें और देशों अथवा प्रदेशों की राजनैतिक स्थिति पर आधारित भेदभाव का विचार किए बिना, विशेषतः विद्यालयों और अन्य शिक्षा संस्थाओं में, इसके प्रचार, प्रदर्शन, पठन और व्याख्या का प्रबंध करें । इसी घोषणा का सरकारी पाठ संयुक्त राष्ट्रों की इन पांच भाषाओं में प्राप्य है ः अंग्रेज़ी, चीनी, फ़्रांसीसी, रूसी और स्पेनी । अनुवाद का जो पाठ यहां दिया गया है, वह भारत सरकार द्वारा स्वीकृत है ।
प्रस्तावना :
चूंकि मानव परिवार के सभी सदस्यों के जन्मजात गौरव और समान तथा अविच्छिन्न अधिकार की स्वीकृति ही विश्व-शांति, न्याय और स्वतंत्रता की बुनियाद है,
 
चूंकि मानव अधिकारों के प्रति उपेक्षा और घृणा के फलस्वरूप ही ऐसे बर्बर कार्य हुय जिनसे मनुष्य की आत्मा पर अत्याचार किया गया, चूंकि एक ऐसी विश्व-व्यवस्था की उस स्थापना को (जिसमें लोगों को भाषण और धर्म की आजादी तथा भय और अभव से मुक्ति मिलेगी) सर्वसाधारण के लिए सर्वोच्च आकांक्षा घोषित किया गया है,
 
चूंकि अगर अन्याययुक्त शासन और जुल्म के विरुद्ध लोगों को विद्रोह करने के लिय - उसे ही अंतिम उपाय समझकर - मजबूर नहीं हो जाना है, तो कनून द्वारा नियम बनाकर मानव अधिकारों की रक्षा करना अनिवार्य है,
 
चूंकि राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों को बढ़ाना जरूरी है,
चूंकि संयुक्त राष्ट्रों के सदस्य देशों की जनताओं ने बुनियादी मानव अधिकारों में, मानव व्यक्तित्व के गौरव और योग्यता में और नर-नारियों के समान अधिकारों में अपने विश्वास को अधिकार-पत्र में दहुराया है और यह निश्चय किया है कि अधिक व्यापक स्वतंत्रता के अंतर्गत सामाजिक प्रगति एवं जीवन के बेहतर स्तर को ऊंचा किया जाएं,
 
चूंकि सदस्य देशों ने यह प्रतिज्ञा की है कि वे संयुक्त राष्ट्रों के सहयोग से मानव अधिकारों और बुनियादी आजादियों के प्रति सार्वभौम सम्मान की वृद्धि करेंगे,
 
चूंकि इस प्रतिज्ञा को पूरी तरह से निभाने के लिए इन अधिकारों और आजादियों का स्वरूप ठीक-ठीक समझना सबसे जरूरी है ।
 
इसलिए, अब,
 
समान्य सभा
घोषित करती है कि मानव अधिकारों की यह सार्वभौम घोषणा सभी देशों और सभी लोगों की समान सफलता है । इसका उद्देश्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति और समाज का प्रत्येक भाग इस घोषणा को लगातार दृष्टि में रखते हुए अध्यापन और शिक्षा के द्वारा यह प्रयत्न करेगा कि इन अधिकारों और आजादियों के प्रति सम्मान की भावना जाग्रत हो, और उत्तरोत्तर ऐसे राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय उपाय किए जाएं जिनसे सदस्य देशों की जनता तथा उनके द्वारा अधिकृत प्रदेशों की जनता इन अधिकारों की सार्वभौम और प्रभावोत्पादक स्वीकृति दे और उनका पालन कराएं ।
 
अनुच्छेद 1
सभी मनुष्यों को गौरव और अधिकारों के मामले में जन्मजात स्वतंत्रता और समानता प्राप्त है । उन्हें बुद्धि और अंतरात्मा की देन प्राप्त है और परस्पर उन्हें भाईचारे के भाव से बर्ताव करना चाहिए ।
 
अनुच्छेद 2
सभी को इस घोषणा में सन्निहित सभी अधिकरों और आजादियों को प्राप्त करने का हक है और इस मामले में जाति, वर्ण, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीतिक या अन्य विचार-प्रणाली, किसी देश या समाज विशेष में जन्म, संपत्ति या किसी प्रकार की अन्य मर्यादा आदि के कारण भेदभाव का विचार न किया जाएगा । इसके अतिरिक्त, चाहे कोई देश या प्रदेश स्वतंत्र हो, संरक्षित हो, या स्वशासन रहित हो, या परिमित प्रभुसत्ता वाला हो, उस देश या प्रदेश की राजनैतिक क्षेत्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्थिति के आधार पर वहां के निवासियों के प्रति कोई फ़रक न रखा जाएगा ।
 
अनुच्छेद 3
प्रत्येक व्यक्ति को जीवन, स्वाधीनता और वैयक्तिक सुरक्षा का अधिकार है ।
अनुच्छेद 4
कोई भी गुलामी या दासता की हालत में न रखा जाएगा, गुलामी-प्रथा और गुलामों का व्यापार अपने सभी रूपों में निषिद्ध होगा ।
 
अनुच्छेद 5
किसी को भी शारीरिक यातना न गी जाएगी और न किसी के भी प्रति निर्दय, अमानुषिक या अपमानजनक व्यबहार होगा ।
 
अनुच्छेद 6
हर किसी को हर जगह कानून की निगाह में व्यक्ति के रूप में स्वीकृति-प्राप्ति का अधिकार है ।
अनुच्छेद 7
कानून की निगाह में सभी समान हैं और सभी बिना भेदभाव के समान कानूनी सुरक्षा के अधिकारी हैं । यदि इस घोषणा का अतिक्रमण करके कोई भी भेदभाव किया जाए या उस प्रकार के भेदभाव को किसी प्रकार से उकसाया जाए, तो उसके विरुद्ध समान सुरक्षण का अधिकार सभी को प्राप्त है ।
 
अनुच्छेद 8
सभी को संविधान या कानून द्वारा प्राप्त बुनियादी अधिकारों का अतिक्रमण करने वाले कार्यों के विरुद्ध समुचित राष्ट्रीय अदालतों की कारगर सहायता पाने का हक है ।
 
अनुच्छेद 9
किसी को भी मनमाने ढंग से गिरफ्तार, नजरबंद, या देश-निष्कसित न किया जाएगा ।
अनुच्छेद 10
सभी को पूर्ण्तः समान रूप से हक है कि उनके अधिकारों और कर्तव्यों के निश्चय करने के मामले में और उन पर आरोपित फौजदारी के किसी मामले में उनकी सुनवाई न्यायोचित और सार्वजनिक रूप से निरपेक्ष एवं निष्पक्ष अदालत द्वारा हो ।
 
अनुच्छेद 11
1. प्रत्येक व्यक्ति, जिस पर दंडनीय अपरोध का आरोप किया गया हो, तब तक निरपराध माना जाएगा, जब तक उसे ऐसी खुली अदालत में, जहां उसे अपनी सफाई की सभी आवश्यक सुविधाएं प्राप्त हों , कानून के अनुसार अपराधी न सिद्ध कर दिया जाए ।
2। कोई भी व्यक्ति किसी भी ऐसे कृत या अकृत (अपराध) के कारण उस दंडनीय अपराध का अपराधी न माना जाएगा, जिसे तत्कालीन प्रचलित राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार दंडनीय अपराध न माना जाए और न अससे अधिक भारी दंड दिया जा सकेगा, जो उस समय दिया जाता जिस समय वह दंडनीय अपराध किया गया था ।
 
अनुच्छेद 12
किसी व्यक्ति की एकांतता, परिवार, घर, या पत्रव्यवहार के प्रति कोई मनमाना हस्तक्षेप न किया जाएगा, न किसी के सम्मान और ख्याति पर कोई आक्षेप हो सकेगा । ऐसे हस्तक्षेप या आक्षेपों के विरुद्ध प्रत्येक को कनूनी रक्षा का अधिकार प्राप्त है ।
 
अनुच्छेद 13
1. प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक देश की सीमाओं के अंदर स्वतंत्रतापूर्वक आने, जाने, और बसने का अधिकार है ।
2। प्रत्येक व्यक्ति को अपने या पराए किसी भी देश को छोड़ने और अपने देश वापस आने का अधिकार है ।
 
अनुच्छेद 14
1. प्रत्येक व्यक्ति को स्ताए जाने पर दूसरे देशों में शरण लेने और रहने का अधिकार है ।
2। इस अधिकार का लाभ ऐसे मामलों में नहीं मिलेगा जो वास्तव में गैर-राजनीतिक अपराधों से संबंधित हैं, या जो संयुक्त राष्ट्रों के उद्देश्यों और सिद्धांतों के विरुद्ध कार्य हैं ।
 
अनुच्छेद 15
1. प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी राष्ट्र-विशेष को नागरिकता का अधिकार है ।
2। किसी को भी मनमाने ढंग से अपने राष्ट्र की नागरिकता से वंचित न किया जाएगा या नागरिकता का परिवर्तन करने से मना न किया जाएगा ।
 
अनुच्छेद 16
1. बालिग स्त्री-पुरुषों को बिना किसी जाति, राष्ट्रीयता या दर्म की रुकावटों के आपस में विवाह करने और परिवार स्थापन करने का अधिकार है । उन्हें विवाह के विषय में वैवाहिक जीवन में, तथा विवाह विच्छेद के बारे में समान अधिकार है ।
2. विवाह का इरादा रखने वाले स्त्री-पुरुषों की पूर्ण और स्वतंत्र सहमति पर ही विवाह हो सकेगा ।
3। परिवार समाज का स्वाभाविक और बुनियादी सामूहिक इकाई है और उसे समाज तथा राज्य द्वारा संरक्षण पाने का अधिकार है ।
 
अनुच्छेद 17
1। प्रत्येक व्यक्ति को अकेले और दूसरों के साथ मिलकर संपत्ति रखने का अधिकार है । 2. किसी को भी मनमाने ढंग से अपनी संपत्ति से वंचित न किया जाएगा ।
 
अनुच्छेद 18
प्रत्येक व्यक्ति को विचार, अंतरात्मा और धर्म की आजादी का अधिकार है । इस अधिकार के अंतर्गत अपना धर्म या विश्वास बदलने और अकेले या दूसरों के साथ मिलकर तथा सार्वजनिक रूप में अथवा निजी तर पर अपने धर्म या विश्वास को शिक्षा, क्रिया, उपसाना, तथा व्यवहार के द्वारा प्रकट करने की स्वतंत्रता है ।
 
अनुच्छेद 19
प्रत्येक व्यक्ति को विचार और उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है । इसके अंतर्गत बिना हस्तक्षेप के कोई राय रखना और किसी भी माध्यम के जरिए से तथा सीमाओं की परवाह न करके किसी की सूचना और धारणा का अन्वेषण, ग्रहण तथा प्रदान सम्मिलित है ।
 
अनुच्छेद 20
1. प्रत्येक व्यक्ति को शांति पूर्ण सभा करने या समित्ति बनाने की स्वतंत्रता का अधिकार है ।
2। किसी को भी किसी संस्था का सदस्य बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता ।
 
अनुच्छेद 21
1. प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश के शासन में प्रत्यक्ष रूप से या स्वतंत्र रूप से चुने गए प्रतिनिधिओं के जरिए हिस्सा लेन का अधिकार है ।
2. प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश की सरकारी नौकरियों को प्राप्त करने का समान अधिकार है ।
३। सरकार की सत्ता का आधार जनता की इच्छा होगी । इस इच्छा का प्रकटन समय-समय पर और असली चुनावों द्वारा होगा । ये चुनावों सार्वभौम और समान मताधिकार द्वारा होंगे और गुप्त मतदान द्वारा या किसी अन्य समान स्वतंत्र मतदान पद्धति से कराए जाएंगे ।
 
अनुच्छेद 22
समाज के एक सदस्य के रूप में प्रत्येक व्यक्ति को सामाजिक सुरक्षा का अधिकार है और प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व के उस स्वतंत्र विकास तथा गौरव के लिए - जो राष्ट्रीय प्रयत्न या अंतर्राष्ट्रीय सहयोग तथा प्रत्येक राज्य के संगठन एवं साधनों के अनुकूल हो - अनिवार्यतः आवश्यक आर्थिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक अधिकारों की प्राप्ति का हक है ।
 
अनुच्छेद 23
1. प्रत्येक व्यक्ति को काम करने, इच्छानुसार रोजगार के चुनाव, काम की उचित और सुविधाजनक परिस्थितियों को प्राप्त करने और बेकारी से संरक्षण पाने का हक है ।
2. प्रत्येक व्यक्ति को समान कार्य के लिएअ बिना किसी भेदभव के समान मजदूरी पाने का अधिकार है ।
3. प्रत्येक व्यक्ति को जो काम करता है, अधिकार है कि वह इतनी उचित और अनुकूल लजदूरी पाए, जिससे वह अपने लिए और अपने परिवार के लिए ऐसी आजीविका का प्रबंध कर सके, जो मानवीय गौरव के योग्य हो तथा आवश्यकता होने पर उसकी पूर्ति अन्य प्रकार के सामाजिक संरक्षणों द्वारा हो सके ।
4। प्रत्येक व्यक्ति को अपने हितों की रक्षा के लिए श्रमजीवी संघ बनाने और उनमें भाग लेने का अधिकार है ।
 
अनुच्छेद 24
प्रत्येक ब्यक्ति को विश्राम और अवकाश का अधिकार है । इसके अंतर्गत काम के घंटों की उचित हदबंदी और समय-समय पर मजदूरी सहित छुट्टियां सम्मिलित है ।
 
अनुच्छेद 25
1.प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे जीवनस्तर को प्राप्त करने का अधिकार है जो उसे और उसके परिवार के स्वास्थ्य एवं कल्याण के लिए पर्याप्त हो । इसके अंतर्गत खाना, कपड़ा, मकान, चिकित्सा-संबंधी सुविधाएं और आवश्यक सामाजिक सेवाएं सम्मिलित है । सभी को बेकारी, बीमारी, असमर्था, वैधव्य, बुढ़ापे या अन्य किसी ऐसी परिस्थिति में आजीविका का साधन न होने पर जो उसके काबू के बाहर हो, सुरक्षा का अधिकार प्राप्त है ।
2। जच्चा और बच्चा को खास सहायता और सुविधा का हक है । प्रत्येक बच्चे को चाहे वह विवाहिता माता से जन्मा हो या अविवाहिता से, समान सामाजिक संरक्षण प्राप्त है ।
 
अनुच्छेद 26
1. प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा का अधिकार है । शिक्षा कम से कम प्रारंभिक और बुनियादी अवस्थाओं में निःशुल्क होगी । प्रारंभिक शिक्षा अनिवार्य होगी । टेक्निकल, यांत्रिक और पेशों-संबंधी शिक्षा साधारण रूप से प्राप्त होगी और उच्चतर शिक्षा सभी को योग्यता के आधार पर समान रूप से उपलब्ध होगी ।
2. शिक्षा का उद्देश्य होगा मानव व्यक्तित्व का पूर्ण विकास और मानव अधिकारों तथा बुनियादी स्वतंत्रताओं के प्रति सम्मान की पुष्टि । शिक्षा द्वारा राष्ट्रों, जातियों, अथवा धार्मिक समूहों के बीच आपसी सद्भावना, सहिष्णुता और मैत्री का विकास होगा और शांति बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्रों के प्रयत्नों को आगे बढ़ाया जाएगा ।
3। माता-पिता को सबसे पहले इस बात का अधिकार है कि वह चुनाव कर सकें कि किस किस्म की शिक्षा उनके बच्चों को दी जाएगी ।
 
अनुच्छेद 27
1. प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्रता-पूर्वक समाज के सांस्कृतिक जीवन में हिस्सा लेने, कलाओं का आनंद लेने, तथा वैज्ञानिक उन्नति और उसकी सुविशाओं में भाग लेने का हक है ।
2। प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी ऐसी वैज्ञानिक साहित्यिक या कलात्मक कृति से उत्पन्न नैतिक और आर्थिक हितों की रक्षा का अधिकार है जिसका रचयिता वह स्वयं है ।
 
अनुच्छेद 28
प्रत्येक व्यक्ति को ऐसी सामाजिक और अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था की प्राप्ति का अधिकार है जिसमें उस घोष्णा में उल्लिखित अधिकारों और स्वतंत्रताओं का पूर्णतः प्राप्त किया जा सके ।
 
अनुच्छेद 29
1. प्रत्येक व्यक्ति का उसी समाज प्रति कर्तव्य है जिसमें रहकर उसके व्यक्तित्व का स्वतंत्र और पूर्ण विकास संभव हो ।
2. अपने अधिकारों और स्वतंत्रताओं का उपयोग करते हुए प्रत्येक व्यक्ति केवल ऐसी ही सीमाओं द्वारा बंध होगा, जो कानून द्वारा निश्चित की जाएंगी और जिनका एकमात्र उद्देश्य दूसरों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं के लिए आदर और समुचित स्वीकृति की प्राप्ति होगा तथा जिनकी आवश्यकता एक प्रजातंत्रात्मक समाज में नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था और समान्य कल्याण की उचित आवश्यकताओं को पूरा करना होगा ।
3। इन अधिकारों और स्वतंत्रताओं का उपयोग किसी प्रकार से भी संयुक्त राष्ट्रों के सिद्धांतों और उद्देश्यों के विरुद्ध नहीं किया जाएगा ।
 
अनुच्छेद 30
इस घोष्णा में उल्लिखित किसी भी बात का यह अर्थ नहीं लगाना चाहिए जिससे य प्रतीत हो कि किसी भी राज्य, समूह या ब्यक्ति को किसी ऐसे प्रयत्न में संलग्न होने या ऐसा कार्य करने का अधिकार है, जिसका उद्देश्य यहां बताए गए अधिकारों और स्वतंत्रताओं में से किसी का भी विनाश करना हो ।
 
== इन्हें भी देखें ==
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