"मानवाधिकार" के अवतरणों में अंतर

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'''मानव अधिकारों''' से अभिप्राय "मौलिक अधिकारों एवं स्वतंत्रता से है जिसके सभी मानव प्राणी हकदार है। अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं के उदाहरण के रूप में जिनकी गणना की जाती है, उनमें नागरिक और राजनीतिक अधिकारों, नागरिक और राजनैतिक अधिकार सम्मिलित हैं जैसे कि जीवन और आजाद रहने का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के सामने समानता एवं आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के साथ ही साथ सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार, भोजन का अधिकार काम करने का अधिकार एवं शिक्षा का अधिकार .
 
'''अपराध कानून और मानवाधिकार'''
 
मानवता के आरंभिक चरण में भी मनुष्य अपराधों का निवारण करता था । तथा वह स्वयं शत्रुओं से बदला लेता था इस कार्य में आवश्यकतानुसार उसके बंधू और मित्र भी सहयोग करते थे लेकिन इस अवस्था में प्रत्येक मनुष्य के प्राण हथेली पर रहते थे उस समय प्रत्येक मनुष्य अपने मामले में स्वयं न्यायाधीश होता था और शारीरिक बल ही एकमात्र न्याय का मापदंड था इसलिए उस समय आवश्यक नही था कि अपराध के लिए निश्चित रूप से दंड दिया ही जाएगा अथवा निरपराध को अपनी सफाई में कुछ बोलने के अवसर या अधिकार प्राप्त होंगे ।
उस समय एक अपराध दुसरे अपराध को जन्म देता था और आनुषंगिक अपराध केवल अपराधी तक ही सीमित नही होता था बल्कि उसके साथ उसके परिवार एवं उसके कबीलों को भी प्रतिरोध का शिकार बनना पड़ता था इस तरह समूहों और कबीलों में संघर्ष छिड़ जाता था जो कई व्यक्तियों और उसके संबंधियों को प्रभावित करता था तथा साथ ही कई-कई पीढियों तक चलता रहता था यह संघर्ष व्यापक रूप से कष्टकारी एवं विध्वंसकारी एवं रक्तरंजित होता था सभ्यता के विकास के साथ-साथ ही इस न्याय के मापदंड में बदलाव आया इन संघर्षों में होने वाली क्षति की क्षतिपूर्ति की व्यवस्था की गई यहाँ तक कि हत्या तक के मामलों में मरने वाले व्यक्ति के संबंधियों को उस व्यक्ति के महत्व के अनुसार रक्त द्रव्य के रूप में धन अदा किया जाने लगा इस प्रकार न्याय प्रशासन ने निश्चित नियमों के तहत एक निश्चित दिशा की तरफ़ कदम बढाया ।
इसके बाद राज्य के उदय होने के साथ ही आपराधिक प्रशासन में भी परिवर्तन आया तथा अपराध नियंत्रण का अधिकार व्यक्ति के हांथों से निकल कर राज्य के हांथों में चला गया उस युग की यह धारणा थी कि अपराध का सम्बन्ध केवल अपराधी और उससे आहत व्यक्ति तक ही सीमित है धूमिल पड़ने लगा और यह भावना कि समाज विरोधी कार्य केवल व्यक्ति के विरुद्ध ही नही वरन राज्य के विरुद्ध अपराध है प्रबल होती गई ।
मनुष्य जब सामाजिक जीवन व्यतीत करना शुरू किया है तभी से समाज में अपराध भी अनेक रूपों से अस्तित्व में आया अन्तर केवल इतना है मानव समाज के विकास के साथ-साथ विकास के अर्थों तथा प्रारूपों में अन्तर होता चला गया दुसरे अन्य व्यवहारों की भांति आपराधिक व्यवहार भी मानव व्यवहार का अंग बन गया इसीलिए मानव व्यवहार का ही एक अंग होने के कारण सामाजिक नियमों, आदर्शों एवं मूल्यों में परिवर्तन के साथ-साथ यह भी बदलता चला गया अर्थात अपराध की अवधारणा अपराध के कारण, प्रकार व करने के ढंग की सभ्यता के विकास के साथ-साथ परिवर्तित होते चले गए ।
इस तरह यह मानने से इंकार नही किया जा सकता कि अपराध एक वास्तविक सामाजिक समस्या है जिसकी प्रवित्ति को समझना तथा उसके विरोध का उपाय करना प्रत्येक समाज का कर्तव्य है मानव समाज में सायद ही कभी ऐसा समय रहा हो जबकि अपराध का अस्तित्व न रहा हो । भारतीय इतिहास के स्वर्ण युग भी अपराधों से विषाक्त थे यह कहा जाता है कि उस समय लोग चोरी नही करते थे इस लिए उस समय लोग अपने घरों में ताले नही लगाते थे लेकिन इसका तात्पर्य यह कदापि नही कि उस समय लोग चोरी नही करते थे वास्तविकता यह थी कि उस समय कानून बहुत कठोर थे तथा उसका पालन भी शक्ति से किया जाता था लेकिन आज तो अपराध निरंतर अबाध गति से बढ़ते ही जा रहे है साधारण तथा सर्वत्र अपराध की प्रवित्ति भी बढ़ती जा रही है ।
अपराधों को रोकने के लिए रोज नये-नये उपाय किए जाने के बावजूद भी उसमे निरंतर बढोत्तरी ही हो रही है जिसे देखते हुए प्रो टेटन बाम का कथन संभवतः सही प्रतीक होता है कि "अपराध को समाज से अलग नही किया जा सकता" इसी प्रकार के विचार फ्रांसीसी समाज शास्त्री दुर्खिम ने व्यक्त किए है कि "पाप के समान अपराध भी समाज की एक सामान्य घटना है और मनुष्य द्वारा निर्मित कानून और प्रथाये असामान्य" दुर्खिम ने अपराध को समाज के लिए उपयोगी बताते हुए कहा है कि अपराध समाज के लिए आवश्यक है सामाजिक जीवन की आधार भूत दशाओं से संबंधित होने के कारण यह इसके लिए उपयोगी भी है "।
ठीक इसी प्रकार डा परिपूर्णानन्द वर्मा का कथन है कि "अपराध हीन समाज कल्याण से परे की वस्तु है । जब नियम बनेंगें तो उसको तोड़ने वाले भी पैदा होंगे नियम की रचना समाज की रचना के साथ होती है दोनों एक दुसरे के साथ साधन और साध्य के समान मिले हुए है अतः इस संबंध में कुछ भी नई बात या नया निदान खोज निकलने का प्रयत्न करना अनंत यात्रा करना है निष्कलंक मनुष्य अथवा निष्कलंक समाज सायद ही कभी मिले चूँकि हम ईश्वर की सत्ता में विश्वास करते है इस लिए हमें केवल भगवान ही निष्कलंक तथा पाप-पुण्य से परे नजर आता है जो लोग प्रभु की सत्ता को नहीं मानते उनके लिए तो यह सहारा भी नही है ।
यद्यपि अपराध समाज की एक अमूर्त अवधारणा है लेकिन कोई भी ऐसा समाज नही है जिसमें किसी न किसी रूप में प्रत्येक काल में अपराध विद्यमान न रहा हो इसलिए इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि एक काल्पनिक एवं मिथ्या समाज को छोड़ कर अपराध को विल्कुल मिटाया नहीं जा सकता ज्यों-ज्यों मानव सभ्यता ने उन्नति की है यह अनुभव किया जाने लगा है कि समाज में कुछ लोग ऐसा व्यवहार करते है जिसके कारण सामाजिक हितों को चोट पहुंचती है । इस प्रकार के कृत्य केवल सामाजिक एकता एवं संगठन को ही नुकसान नहीं पहुँचाते वरन उसके अस्तित्व को ही खतरा पैदा कर देते है ।
अपराध की परिभाषा :
साधारण बोल-चाल की भाषा में "अपराध" शब्द का अभिप्राय उस कार्य से है जिसे समाज अनैतिक व अनुचित मानता है और समझता है तथा जिसको सामाजिक शान्ति का विनाशक मानता है प्रत्येक समाज की निश्चित व्यवस्था होती है इस व्यवस्था के बने रहने में ही अधिकाधिक समाज कल्याण की आशा की जा सकती है तथा समाज भी प्रगति की दिशा की ओर बढ़ सकता है इस व्यवस्था को बनाये रखने के लिए कुछ वैधानिक प्रतिमान बना दिए जाते है जिसके पालन पर ही समाज की आन्तरिक संरचना और बाहरी व्यवस्था निर्भर करती है जो व्यक्ति इन नियमों का पालन नहीं करते अथवा दुसरे शब्दों में जो व्यक्ति समाज के नियमों का पालन नहीं करते अथवा दुसरे शब्दों में जो व्यक्ति समाज के नियमों, आदर्शों एवं मूल्यों के विरुद्ध आचरण करते है और समाज की व्यवस्था को धक्का पहुचाते है तथा सामाजिक संगठन को छिन्न-भिन्न करने का खतरा पैदा करते है उनके इस विशेष व्यवहार को अपराध कहा जाता है ।
लेकिन अगर इसको वास्तविक रूप से समझा जाए तो इसका अर्थ बहुत व्यापक है जिसकी व्याख्या करना बडा कठिन कार्य है वस्तुतः समाज विरोधी व्यवहार ही अपराध है जिन समाजों में कानून की विकसित व्यवस्था होती है वहां उसी आचरण को अपराध कहते है जो कि कानून की दृष्टि में अपराध है, कानून का उल्लंघन है इसी प्रकार जिन समुदायों में आचरण संहिता का बोलबाला होता है उसमे नैतिकता के नियमों का उल्लंघन अपराध कहलाता है इस विषय पर अटेबरी व हंट का कहना है कि "अपराध वह कार्य है जो कि किसी निर्दिष्ट समय में अथवा निर्दिष्ट स्थान पर किसी समूह के पूर्व स्थापित व्यवहारों का विरोध करता है" जब अपराध की व्याख्या समाज विरोधी व्यवहार के रूप में की जाती है । तो इसका आरंभ वास्तव में अनैतिक अथवा अवांछनीय अथवा अपेक्षित व्यवहार के रूप में की जाती है परन्तु क्या सभी नैतिक मूल्यों को प्रभावित करने वाले कृत्य अपराध है ? उदाहरण के तौर पर बच्चे द्वारा माता पिता की आज्ञा का पालन न करना नैतिकता के खिलाफ तो हो सकता है लेकिन क्या इसे अपराध कहा जा सकता है ? संभवतः नहीं ।
 
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