"यूरोपीय ज्ञानोदय" के अवतरणों में अंतर

यूरोप में 17वीं-18वीं शताब्दी में हुए क्रांतिकारी परिवर्तनों के कारण इस काल को प्रबोधन, ज्ञानोदय अथवा विवेक का युग कहा गया और इसका आधार पुनर्जागरण, धर्मसुधार आंदोलन व वाणिज्यिक क्रांति ने तैयार कर दिया था। पुनर्जागरण काल में विकसित हुई वैज्ञानिक चेतना ने, तर्क और अन्वेषण की प्रवृत्ति ने 18वीं शताब्दी में परिपक्वता प्राप्त कर ली। वैज्ञानिक चिंतन की इस परिपक्व अवस्था को 'प्रबोधन' के नाम से जाना जाता है। प्रबोधनकालीन चिंतकों ने इस बात पर बल दिया कि इस भौतिक दुनिया और प्रकृति में होने वाली घटनाओं के पीछे किसी न किसी व्यवस्थित अपरिवर्तनशील और प्राकृतिक नियम का हाथ है। [[फ्रांसिस बेकन]] ने बताया कि विश्वास मजबूत करने के तीन साधन हैं- अनुभव, तर्क और प्रमाण; और इनमें सबसे अधिक शक्तिशाली [[प्रमाण]] है क्योंकि तर्क/अनुभव पर आधारित विश्वास स्थिर नहीं रहता।
 
===विशेषताएँ===
 
===ज्ञान को विज्ञान के साथ जोड़ना ===
प्रबोधन के चिंतकों ने ज्ञान को प्राकृतिक विज्ञानों के साथ जोड़ दिया। पर्यववेक्षण, प्रयोग और आलोचनात्मक छानबीन की व्यवस्थित पद्धति का प्रयोग ज्ञानोदय के चिंतकों की नजर में सत्य तक पहुँचने का सक्षम आधार थी। उनके मुताबिक ज्ञान को प्रयोग एवं परीक्षा योग्य होना चाहिए। इसके पास ऐसे प्रमाण होना चाहिए जो बोधगम्य हो और मानव मस्तिष्क की पहुँच में हो। ज्ञान की इसी धारणा के आधार पर प्रबोधन ने पराभौतिक अनुमान और ज्ञान में विरोध बताया।