"यूरोपीय ज्ञानोदय" के अवतरणों में अंतर

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==प्रबोधनयुगीन चिंतन एवं पुनर्जागरण में अंतर==
*(१) [[पुनर्जागरण]]कालीन मध्यवर्ग अभी आत्मविश्वास से युक्त नहीं था अतः वह इस बात पर बल देता था कि अतीत से प्राप्त ज्ञान की श्रेष्ठ है और बुद्धि की बात करते हुए उदाहरण के रूप में [[ग्रीक]] एवं [[लैटिन]] साहित्य पर बल देता था। जबकि प्रबोधनकालीन मध्यवर्ग में शक्ति और आत्मविश्वास आ चुका था इस कारण उसने [[राजतंत्र]] की निरंकुशता एवं [[चर्च]] के आंडबर के खिलाफ आवाज उठाई और तर्क के माध्यम से अपनी बात व्यक्त की।
 
*(२) पुनर्जागरण का बल ज्ञान के सैद्धांतिक पक्ष पर अधिक था जबकि प्रबोधन चिंतन का मानना था कि ज्ञान वही है जिसका परीक्षण किया जा सके और जो व्यावहारिक जीवन में उपयोग में लाया जा सके। इस तरह प्रबोधकालीन चिंतन का बल व्यावहारिक ज्ञान पर था।
 
*(३) पुनर्जागरणकालीन वैज्ञानिक अन्वेषण निजी प्रयास का प्रतिफल था। दूसरी तरफ प्रबोधनकालीन वैज्ञानिक अन्वेषण तथा वैज्ञानिक क्रांति सामूहिक प्रयास का नतीजा था।
 
==प्रबोधन का प्रभाव==
* आधुनिक विश्व के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ।
 
* वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रगति ने औद्योगीकरण के नया युग का आधार तैयार किया।
 
* निरकुश राजतंत्र पर चोट, फलतः लोकप्रिय सरकारों की स्थापना।
 
* चिंतकों के द्वारा प्रतिपादित व्यक्ति स्वातंत्र्य की बात ने उदारवादी सरकार के निर्माण मार्ग का प्रशस्त किया।
 
* व्यक्ति स्वतंत्र पैदा हुआ है जैसे नरि और व्यक्ति की स्वतंत्रता की मांग ने आर्थिक स्वतंत्रता को प्रोत्साहित किया। इस तरह वाणिज्यवादी, आर्थिक नीति से मुक्त अर्थव्यवस्था की ओर जाने की बात की जाने लगी और इसकी अभिव्यक्ति [[एडम स्मिथ]] के 'द वेल्थ ऑफ नेशन्स' (1776) में देखी जा सकती है। एडम स्मिथ का कहना था कि प्रकृति के नियम की तरह बाजार के भी अपने शाश्वत् नियम है। अतः इसमें बाह्य हस्तक्षेप की गुजाइश नहीं है और बाजार के ये शाश्वत् नियम मांग और पूर्ति पर आधारित है। इस तरह विश्व के समक्ष “मुक्त अर्थव्यवस्था” का सिद्धान्त प्रतिपादित हुआ जिसे वर्तमान में काफी महत्व दिया जाता है।
 
* [[भारत]] में 19वीं सदी में चले सामाजिक सुधार आंदोलन पर भी इसका असर दिखाई पड़ता है। आधुनिकीकरण के सिद्धांतों ने समाजों को वर्गीकृत करने और आधुनिक लोकतांत्रिक शासन का मॉडल खड़ा करने के लिए अतीत और वर्तमान, परम्परा और आधुनिकता संबंधी ज्ञानोदय की समझदारी से मदद ली। समाज सुधार आंदोलनों ने ज्ञानोदय के मानवतावादी विचारों से प्रेरणा ली और धर्म तथा रीति-रिवाजों को मानव विवेक के सिद्धान्तों के अनुरूप ढालते की कोशिश की। उन्होंने पारंपरिक रस्मों रिवाजों की आलोचनात्मक परीक्षा की और उन रीतियों को बदलने की लड़ाई लड़ी जो समानता और सहिष्णुता के बुनियादी, सिद्धान्तों के खिलाफ थी। इस समाज सुधारकों पर प्रबोधन का इतना गहरा असर था कि उन्होंने अंगे्रजी शासन के साथ आने वाले नए विचारों का स्वागत किया और उन्हें विश्वास था कि जब कभी वे स्वशासन की मांग करेंगे उन्हें मिल जाएगा। हालांकि औपनिवेशिक शासन के शोषण चरित्र को सब लोग मानते हैं लेकिन प्रबोधनकालीन व्यक्ति की धारणा, वैज्ञानिक ज्ञान और स्वतंत्र उद्यम में तत्कालीन विश्वास आज भी लोकप्रिय कल्पना को प्रभावित करता है।
 
==सीमाएँ==
* प्रबोधनकालीन प्रमुख चिंतक मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी थे। यह चिंतन बुर्जुवा विश्वदृष्टि को अभिव्यक्ति करता है। अतः वे मध्यवर्ग के हितों से परिचालित थे।
 
* ये बुद्धिजीवी कानून के शासन तथा विधि निर्माण पर बल देते थे परन्तु विधि निर्माण में मध्यवर्ग का ही वर्चस्व स्थापित करना चाहते थे।
 
* इन चिंतकों की दृष्टि कुछ हद तक “[[युटोपिया|यूटोपियन]]” प्रतीत होती हैं क्योंकि ये भविष्य के प्रति अतिरिक्त आशावादी दिखाई देते थे।
 
* प्रबोधन चिंतको ने [[विज्ञान]] के संबंध में यह मत व्यक्त किया कि विज्ञान बेहतर दुनिया बना सकता है जिसमें व्यक्ति स्वतंत्रता और खुशी का आनंद उठा सकता है और विज्ञान का उपयोग मानव हित में किया जा सकता है। विज्ञान के प्रति उस विश्वास को 20वीं सदी के उत्तर्राद्ध में चुनौती मिली जब विज्ञान ने और तकनीकी विकास ने हिंसा और असमानता को बढ़ावा दिया।
 
==इन्हें भी देखें==