"यूरोपीय ज्ञानोदय" के अवतरणों में अंतर

प्रबोधन युग के चिंतकों ने मानव के खुशी और भलाई पर बल दिया। उसके अनुसार मनुष्य स्वभाव से ही विवेकशील और अच्छा है किन्तु स्वार्थी धर्माधिकारियों और उनके बनाए गए नियमों ने मनुष्य को भ्रष्ट कर दिया यदि मनुष्य अपने को इन स्वार्थी धर्माधिकारियों के चुंगल से मुक्त कर सके तो एक आदर्श समाज की स्थापना की जा सकती है। प्रबोधन के चिंतको का मानना था कि दुनिया मशीन की तरह है जिनका नियंत्रण व संचालन कुछ खास नियमों के तहत् होता है। फलस्वरूप उन्हें आशा बनी कि इस अंतर्निहित नियमों को खोज वे ब्रह्माण्ड के रहस्य को समझ लेंगे और फिर उस पर काबू पा लेंगे। इसका उद्देश्य व्यक्तियों को अपने पर्यावरण पर नियंत्रण स्थापित करने में समर्थ बना देना था ताकि वे प्राकृतिक शक्तियों की विध्वंसात्मक शक्तियों से अपनी रक्षा कर सके साथ ही साथ प्रकृति की ऊर्जा का मानव जाति के फायदे के लिए इस्तेमाल कर सके। [[आइजक न्यूटन|न्यूटन]] ने प्रकाश के मौलिक रहस्यों का पता लगाया और प्रकाश विज्ञान की स्थापना की। बेंजामिन फ्रैंकलिन सहित कई लोगों ने विद्युत की खोज में अपना योगदान दिया।
 
===[[देववाद]]===
प्रबोधन युगीनप्रबोधनयुगीन चिंतकों ने कहा कि कोई परमसत्ता है और इस दुनिया के समस्त प्राणी उसी के बनाए हुए हैं ओरऔर इन सबके साथ क्रूरता का नहीं बल्कि दयालुता का आचरण करना चाहिए। इसके अनुसार [[ईश्वर]] की तुलना उस घड़ी-निर्माता से की जा सकती है जो [[घड़ी]] के निर्माण के बाद यह निर्देश नहीं देता कि उसमें समय का निर्देशन कैसे हो ?हो। इस देवसाद[[देववाद]] (Deism / प्राकृतिक धर्म) में रीति-रिवाज, अनुष्ठानों तथा अप्राकृतिक तत्त्वों का बहिष्कार कर दिया गया और सभी मनुष्यों की समानता और सहिष्णुता को नए आधार के रूप में ग्रहण किया गया। इस तरह प्राकृतिक धर्म मनुष्यता का धर्म था और यह धर्म लोगों में दूसरों की खिल्ली उड़ाने और नफरत पैदा करने का स्त्रोत नहीं बनेगा, ज्ञानोदय (प्रबोधन) के चिंतकों का ऐसा मानना है। था।
 
===समानता एवं स्वतंत्रता पर बल===