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[[चित्र:Charandas.jpg|right|thumb|300px200px|चरणदास की प्रतिमा (चरणदास मंदिर, पुरानी दिल्ली)]]
'''सन्त चरणदास''' (१७०६ - १७८५) [[भारत]] के योगाचार्यों की श्रृंखला में सबसे अर्वाचीन [[योगी]] के रूप में जाने जाते है। आपने 'चरणदासी सम्प्रदाय' की स्थापना की। इन्होने समन्वयात्मक दृष्टि रखते हुए योगयोगसाधना को विशेष महत्व दिया।
 
==परिचय==
चरण दास जी का जन्म् सन् 1706 ई0 में [[राजस्थान]] के [[अलवर जिला]] ([[मेवाड़]] क्षेत्र) के डेहरा ग्रांम में हुआ था। बचपन में इनकी माता का देहान्त हो गया था। इनके पिता ने भी इस समय गृहत्याग दिया था। इस कारण चरणदास जी को उनके नाना जो कि [[दिल्ली]] में निवास करते थे, अपने साथ दिल्ली ले कर आ गये। इस समय चरणदास जी मात्र 7 वर्ष के थे। इस काल में भारत अनेकों सामाजिक कुरीतियों का शिकार था। ऊँच-नीच जाति-पांति का विकृत स्वरूप था। जनता मनसबदारों से त्रस्त थी। समाज में समाजिक मूल्यों का पतन हो चुका था। तांत्रिक बौद्धों के प्रभाव अभी जीवित बने हुऐ थे। छोटे-छोटे राजा आपस में लड़कर पाश्चात्य राजसत्ता के समक्ष अपना सब कुछ गवाँ रहे थे। अषतोष असुरक्षा सांस्कृतिक धार्मिक शून्यता फैलती जा रही थी। ऐसे समय में चरणदास जी [[कृष्ण ]]-भक्ति की सशक्त डोर लिए जीवन के लक्ष्य साधन हेतु [[अष्टांग योग]] की साधना का प्रचार करने लगे। 79 वर्ष की अवस्था में सन् 1785 ई0 में चरणदास जी समाधिस्थ हुए। एक ही स्थान पर जीवनपर्यन्त इनकी योगसाधना चलती रही। आज भी [[जामा मस्जिद]] के पास इनका आखाड़ा इनके बताये अनुशासनों के अनुसार सक्रिय है। हजारों योग अनुयायी आज भी इनके बताये मार्ग पर साधनाशील है।
 
==कृतियाँ==
 
==अष्टांगयोग ग्रंथ की विषयवस्तु==
अष्टांग योग ग्रंथ शिष्य की जिज्ञासाओं का समाधान गुरूवचनों द्वारा की जाने वाली संवाद शैली मे प्रस्तुत किया गया है। शिष्य का प्रश्न शुरू होता है कि मैं योग साधना में पूर्णतः (निपट) आज्ञानी हूँ, कृपया मुझे योग के आठ अंगों के बारे में समझाइये तथा उनको साधने की (अभ्यास करने की) विधि बतलाइये। यह भी स्पष्ट कीजिये की इसे 'अष्टांग योग' क्यों ? कहा जाता है। गुरू वंदना के बाद शिष्य के इस प्रश्न के उत्तर में चरणदास जी गुरूवचन के रूप में अष्टांग योग तथा उनके अलग-अलग अंगों की साधना विधि को बतलाने का आश्वासन इस आधार पर देते है कि पहले साधक को इन्हें समझने के लिए [[संयम]] का पालन करना होता है जिससे योग के अभ्यास में बाधा नहीं होती है।
 
यहाँ 'गुरुवचन' से यह भी ध्वनित होता है कि योग 'समझने का विषय' नही नहीं है। यह अभ्यास के सोपान हैं तथा तथा 'होने का विषय' है। अर्थात् योग को समझ कर योगी नहीं बना जा सकता, योग करके (साधना द्वारा) ही योगी हुआ जा सकता है। योग क्रियापरक धातु है।
शिष्य प्रश्न और गुरू के वचन (उत्तर) के रूप में चरणदास जी के इस अष्टांग योग ग्रंथ के वर्ण्य विषय निम्नांकित है-
: (1) संयम (2) यम-नियम (3) आसन (4) प्राणायाम (5) प्रत्याहार (6) ध्यान (7) सामाधि।
 
==सन्दर्भ==
{{टिप्पणीसूची}}
 
[[श्रेणी:योगी]]