"सन्त चरणदास" के अवतरणों में अंतर

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शिष्य प्रश्न और गुरू के वचन (उत्तर) के रूप में चरणदास जी के इस अष्टांग योग ग्रंथ के वर्ण्य विषय निम्नांकित है-
: (1) संयम (2) यम-नियम (3) आसन (4) प्राणायाम (5) प्रत्याहार (6) ध्यान (7) सामाधि।
 
अष्टांगयोग ग्रन्थ का आरम्भिक भाग नीचे दिया गया है-
'''शिष्यवचन'''
:व्यासपुत्र धनि धनि तुम्हीं, धनि धनि यह अस्थान। मम आशा पूरी करी, धनि धनि वह भगवान ॥ 1
:तुम दर्शन दुरलभ महा, भये जु मोको आज। चरण लगो आपा दियो, भये जु पूरण काज॥ 2
:चरणदास अपनो कियो, चरणन लियो लगाय। शिरकरधरिसबकछुदियो, भक्ति दई समुझाय॥ 3
:बालपने दरशन दिये, तबहीं सब कुछ दीन। बीज जु बोया भक्तिका, अब भया वृक्ष नवीन॥ 4
:दिन दिन बढ़ता जायगा, तुम किरपा के नीर। जब लगमाली ना मिला, तबलग हुता अधीर॥ 5
:अरू समुझाये योगही, बहु भांति बहु अंग। उरधरेता ही कही, जीतन बिद अनंग॥ 6
:अरू आसन सिखलाइया, तिनकी सारी विद्धि॥ तुम्हरी कृपा सो होहिंगे, सबहीसाधन सिद्धि॥ 7
:इक अभिलाषा और है, कहि न सकूं सकुचाय। हिये उठै मुख आयकरि, फिरि उलटी ही जाय॥ 8
 
'''गुरूवचन'''
:सतगुरू से नहिं सकुचिये, एहो चरणहि दास। जो अभिलाषा मन विषे, खोलि कहौ अब तास॥ 9
 
'''शिष्यवचन'''
:सतगुरू तुम आज्ञा दई, कहूँ आपनी बात। योगअष्टांग बुझाइये, जाते हियो सिरात॥ 10
:मोहि योग बतलाइये, जोहै वह अष्टांग। रहनीगहनी विधिसहित, जाके आठो आंग॥ 11
:मत मारग देखे घने,हृां सियरे भये प्रान। जो कुछ चाहौ तुम करौ, मैं हौं निपट अयान॥ 12
 
'''गुरूवचन'''
:योग अष्टांग बुझाइहैं, भिन्न सब अंग। पहिले संयम सीखिये, जाते होय न भंग॥ 13
 
'''शिष्यवचन'''
:संयम काको कहत ह हैं, कहौ गुरू शुकदेव। सो सबही समुझाइये, ताको पावै भेव॥ 14
 
'''गुरूवचन'''
:प्रथम सूक्ष्म भोजन खावै। क्षुधा मिटैं नहि आलस आवै॥
:थोड़ासा जल पीवन लीजै। सूक्ष्म बोलै वाद न कीजै॥
:बहुत नींद भर सोवै नहीं। दूजा पुरूष न राखै पाहीं॥
:खट्टा चरपरा खार न खावै। बीरज क्षींण होन नहीं पावै॥ 15
:करै न काहू बैरी मीता। जगवस्तु की रखे न चीता॥
:निश्चल हवे मनको ठहरावै। इन्द्रिन के रस सब बिसरावै॥
:तिरया तेल नाहिं देह छुवावै। अष्ट सुगन्ध अंग नहिं लावै॥
:पुरूषन की राखै नहि आसा। गुरूका रहै चरणही दासा॥ 16
:काम क्रोध मद लोभ अरू राखै ना अभिमान।
:रहै दीनताई लिये, लगै न माया बान॥ 17
 
==सन्दर्भ==