"चीन की साम्यवादी क्रांति" के अवतरणों में अंतर

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[[चित्र:China, Mao (2).jpg|right|thumb|300px|[[पीपल्स रिपब्लिक ओफ़ चायना|चीनी लोक गणराज्य]] की स्थापना की घोषणा करते हुए [[माओ त्से-तुंग|माओ]]]]
[[चीनी साम्यवादी दल]] की स्थापना १९२१ में हुई थी। सन १९४९ में चीनी साम्यवादी दल का [[चीन]] की सत्ता पर अधिकार करने की घटना '''चीनी साम्यवादी क्रांति''' कहलाती है। चीन में १९४६ से १९४९ तक [[चीन का गृहयुद्ध|गृहयुद्ध]] की स्थिति थी। इस गृहयुद्ध का द्वितीय चरण साम्यवादी क्रान्ति के रूप में सामने आया। चीन ने आधिकारिक तौर पर इस अवधि को 'मुक्ति संग्राम' (War of Liberation , सरल चीनी : 解放战争; परम्परागत चीनी: 解放戰爭; [[फीनयिन]]: Jiěfàng Zhànzhēng) कहा जाता है।
 
==परिचय==
19वीं सदी के मध्य तक [[चीन]] अपने गौरवपूर्ण इतिहास से लगभग अनभिज्ञ, ध्वस्त, पस्त एक एशियाई देश बचा रह गया था। भले ही वह औपचारिक रूप से किसी विदेशी ताकत का उपनिवेश नहीं था परन्तु उसकी हालत किसी दूसरे गुलाम देश से बेहतर नही थी। इतिहासकार चीन में यूरोपीय शक्तियों के संघर्ष को “खरबूजे का बटवारा” कहते थे, ऐसा फल जिसे अपनी इच्छानुसार शक्तिसंपन्न व्यक्ति फांक-फांक काटकर आपस में बांटते, खाते पचाते रहते हैं। चीन के प्रमुख शहरों में ऐसे अनेक इलाके थे जिन पर यूरोपीय ताकतों का कब्जा था और जहाँ चीनी शासक का राज नहीं चलता था। तटवर्ती बंदरगाह भी यूरोपियों के सैनिक नियंत्रण में थे। ब्रिटेन की नौसैनिक शक्ति का मुकाबला करने की क्षमता चीन में नहीं थी इसलिए चीन के व्यापार पर उन्हीं का नियंत्रण था। [[ब्रिटेन]] ने अपने स्वार्थों की रक्षा के लिए चीन में [[अफीम]] के सेवन को बढ़ावा दिया था और इस नशे में गालिफ नीनियोंचीनियों का भरपूर उत्पीड़न किया था। अतः यह स्वाभाविक था कि राष्ट्रपे्रमी चीनियाें के मन में इन उत्पीड़क परिस्थितियों के प्रति आक्रोश पनप रहा था।
 
चीन की पहली क्रांति का स्वरूप मुख्यतः सांस्कृतिक था और इसका सूत्रपात डॉ. [[सनयात सेन]] ने किया था। उन्हीं के प्रयत्नों से राष्ट्रवादी चीनी पार्टी की स्थापना हुई जिसे ''''कुओमितंग'''' के नाम से जाना जाता है।
 
1911 में जिस [[मांचू राजवंश]] का अंत कर गणतंत्र की स्थापना की गई उसका अस्थायी राष्ट्रपति [[युवान शिह काई]] था। किन्तु उसने प्रतिक्रियावादी एवं दमनात्मक कदम उठाते हुए कुओमितांग दल पर प्रतिबंध लगा दिया और सनयात सेन को [[जापान]] भागना पड़ा। 1916 में [[युवान शिह]] काई की भी मृत्यु हो गई और उसकी मृत्यु के पश्चात प्रांतीय गवर्नर व सेनापतियों ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया, पूरा चीन अनेक युद्ध सरदारों (टूचेन) के नियंत्रण में बंट गया। 1917 ई. में कुओमितांग दल ने अराजकता के माहौल में गणतांत्रिक सरकार की स्थापना का प्रयास किया। इसी समय [[रूस]] में हुई [[रूसी क्रांति|साम्यवादी क्रांति]] से प्रभावित होकर 1923 में सनयात सेन ने रूसी साम्यवादी सरकार से सहयोगात्मक संधि कर गणतांत्रिक सरकार बनाने का प्रयास किया किन्तु 1925 में उनकी मृत्यु के कारण यह पूरा नही हो पाया। आगे उनके उत्तराधिकारी [[च्यांग काई शेक]] को चीन के साम्यवादी दल के साथ गृह युद्ध में फंसना पड़ा। अंततः [[माओत्से तुंग]] के नेतृत्व में साम्यवादी दल ने 1 अक्टूबर, 1949 को चीनी लोक गणराज्य (पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना) की स्थापना की।
 
==चीन में साम्यवादी क्रांति की परिस्थितियाँ एवं विकास==
1917 में हुई रूस की [[रूसी क्रांति|बोल्शेविक क्रांति]] के प्रभाव से चीनी भी अछूता न रहा। 1919 में पेकिंग के अध्यापकों व छात्रों ने [[साम्यवाद]], [[मार्क्सवाद]] के अध्ययन के लिए एक संस्था की स्थापना की। इन्हीं व्यक्तियों में माओत्से तुंग भी शामिल था जो आगे चलकर चीनी साम्यवादी दल का नेता बना। 1919 में इन्हीं लोगों के प्रयास से चीनी साम्यवादी दल (कुंगचांगतांग) की स्थापना हुई। शीघ्र ही [[कैंटन]], [[शंघाई]] और [[हूनान]] प्रांतों में भी कम्यूनिस्ट पार्टी की शाखाएँ कायम हो गई और 1921 में शंघाई में इन सब शाखाओं का प्रथम सम्मेलन हुआ जिसमें विदेशी आधिपत्य से चीन को मुक्ति दिलाना लक्ष्य घोषित किया गया।
 
इस साम्यवादी विचारधारा ने चीन के उदार राष्ट्रवादियों को भी प्रभावित किया जिनमें [[सनयात सेन]] भी शामिल थे। वस्तुतः डॉ. सनयात सेन चीन को संगठित करने के लिए विदेशी सहायता प्राप्त करना चाहता था लेकिन पश्चिम के साम्राज्यवादी राज्यों ने उनकी कोई मदद नहीं की अंततः वह [[सोवियत संघ]] की ओर आकृष्ट हुआ। रूस ने साम्यवादी प्रसार के लोभ में चीन के प्रति सहानुभूति जताई और उसे हर तरह की सहायता देने का आश्वासन दिया। इसी संदर्भ में 1921 ई. में कॉमिन्टर्न के प्रतिनिधि मेरिंग ने सनयात सेन से मुलाकात कर आपसी सहयोग की चर्चा की।
 
डॉ. सनयात सेन के सूझबूझ एवं संगठनात्मक क्षमता की वजह से कुओमितांग तथा चीनी साम्यवादी दल में सहयोगपूर्ण संबंध बने। रूसी साम्यवादी विचारकों ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को कुओमितांग दल के साथ मिलजुल कर कार्य करने को कहा। दोनों मिलकर वहाँ [[साम्राज्यवाद]] के विरूद्ध कार्य करने लगे। सनयात सेन के जीवित रहने तक यह सहयोग बना रहा और दोनों दल मिलजुल कर कार्य करते रहे। किन्तु '''12 मार्च, 1925 को सनयात सेन की मृत्यु हो गई।गई'''। तत्पश्चात् चीनी साम्यवादी दल तथा कुओमितांग के बीच मतभेद उत्पन्न होने लगे। वस्तुतः चीनी साम्यवादी अपने संगठन को सुदृढ़ करने का प्रयास कर रहे थे। उन्होंने किसानों और मजदूरों को अपने पक्ष में संगठित किया और राष्ट्रीय स्तर पर एक मजदूर संघ की स्थापना की। फलतः मजदूरों की हड़तालों तथा मांगों की बारंबारता में वृद्धि हुई। इसी तरह किसानों के संघ बने जिन्होंने लगान में कमी तथा जमींदारी उन्मूलन की मांग की। सनयात सेन की मृत्यु के पश्चात 1925 में माओत्से तुंग ने [[हूनान प्रांत]] में एक उग्र किसान आंदोलन चलाया। इस आंदोलन ने न सिर्पसिर्फ जमींदारों को उखाड़ फेंका बल्कि सम्पत्ति पर कब्जा कर समाज के ढांचे को बदला।
 
सनयात सेन की मृत्यु के बाद कुओमितांग दल का प्रधान [[च्यांग काई शेक]] बना। उसकी सद्भावना व्यावसासियों व जमींदारों के साथ थी। उसने साम्यवादियों को कुओमितांग दल से निष्कासित कर दिया। च्यांग का मानना था कि कम्युनिस्ट शक्तिशाली होते जा रहे हैं जो जमींदारों पर आक्रमण कर उनकी सम्पत्ति पर कब्जा कर रहे हैं। अतः इन्हें समाप्त करना आवश्यक है। च्यांग काई शेक ने कम्युनिस्टों को पार्टी से निकाल कर शुद्धीकरण आंदोलन चलाया जिसमें हजारों कम्युनिस्ट, ट्रेड यूनियनिस्ट तथा किसान नेता मारे गए। इस तरह च्यांग काई शेक ने नानकिंग में अपनी सत्ता को मजबूती से स्थापित किया।
 
19131943 ई. में माओत्से तुंग चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय समिति का अध्यक्ष हुआ और शीर्षस्थलशीर्षस्थ नेता बन गया। माओ के नेतृत्व में साम्यवादी दल ने अपनी शक्ति का विस्तार किया और “कियांग्सी” प्रांत में अपनी सत्ता का केन्द्र बनाया। धीरे-धीरे फ्रूकिएन, हूनान आदि प्रांतों में भी अपनी सत्ता सरकारें स्थापित की। मीओ ने कम्यूनिस्ट पार्टी की रणनीति में व्यापक परिवर्तन करते हुए इस बात पर जोर दिया कि कम्युनिस्ट पार्टी को औद्योगिक मजदूरों की तुलना में किसानों के बीच जनसमर्थन प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए। कारण यह था कि चीन मूलतः एक कृषि प्रधान देश था जहाँ औद्योगिक क्रांति अभी पिछड़ी हुई थी। कियांग्सी प्रांत की कम्युनिस्ट माओं सरकार नानकिंग की कुओमितांग सरकार की सत्ता को स्वीकार नहीं करती थी।
 
च्यांग काई चेक के अधीन नानकिंग की सरकार अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए कियांग्सी की कम्यूनिस्ट सरकार के विरूद्ध 1934 ई. में भयंकर अभियान किया। इसे “उन्मूलन अभियान” के नास से जाना जाता है। लाखों की संख्या में कम्युनिस्टों को मौत के घाट उतारा गया। इस दमन और अत्याचार से बचने के लिए साम्यवादियों ने उत्तर में शेन्सी प्रांत की ओर “महाप्रस्थान” (Long March) किया जो 16 अक्टूबर, 1934 से प्रारंभ होकर 20 अक्टूबर, 1935 में पूरा हुआ। इस 6000 मील लम्बी दूरी को अनेक नदियों, पहाड़ों, जंगलों को पार करते हुए शेन्सी प्रांत के येनान नगर में पहुँच कर उसे राजधानी बनाकर वहाँ अपनी सरकार स्थापित की।
 
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि 1921 ई. में [[जापान]] ने चीन पर आक्रमण कर दिया था। च्यांग काई शेक ने इस समय जापानी खतरे से बड़ा खतरा [[साम्यवाद]] को समझा और अपनी सम्पूर्ण शक्ति साम्यवादियों के दमन में लगा दी। साम्यवादियों ने महाप्रस्थान कर जिस शेन्सी प्रांत में अपनी सरकार स्थापित की वह जापान द्वारा अधिकृत उत्तरी चीन के निकट था और साम्यवादियों ने जापानी आक्रमण और प्रभुत्व के विरोध की बात की। माओ ने कहा कि कुओमितांग और साम्यवादियों दोनों को मिलकर देश में एक सरकार की स्थापना करनी चाहिए और मिलकर जापानी आक्रमण का मुकाबला कर, उन्हें देश में एक सरकार की स्थापना करनी चाहिए और मिलकर जापानी आक्रमण का मुकाबला कर, उन्हें देश से बाहर कर देना चाहिए। साम्यवादियों के इस दृष्टिकोण से चीनी जनता का बहुमत उनके साथ हो गया फलतः साम्यवादी को अपनी शक्ति बढ़ाने का मौका मिला।
 
च्यांग काई शेक जापानियों को रोकने के बजाय कम्युनिस्टों का सफाया करना अधिक महत्वपूर्ण मानता था और इसलिए 1936 में साम्यवादियों से संघर्ष करने के लिए लियांग के नेतृत्व में एक सेना शेन्सी प्रांत भेजी किन्तु साम्यवादियों ने अपने चीनी भाईयों से लड़ना उचित नहीं समझा और लियांग के अधीन भेजी गई सेना को राष्ट्रीय चेतना से युक्त कर जापनियों से संघर्ष करने को कहा। जब च्यांग काई शेक ने साम्यवादियों के दमन की ही बात की तब लियांग ने उसे बंदी बना लिया किन्तु साम्यवादियों के हस्तक्षेप से अंततः वह मुक्त हुआ। अतः चीनी लोकमत की इच्छा को देखते हुए च्यांग ने साम्वादियों के साथ बातचीत आरंभ की और 1937 में एक समझौता किया ताकि सम्मिलित प्रयास करते हुए जापान के प्रभुत्व को नष्ट किया जा सके। इस समझौते के अनुसार उत्तर-पश्चिमी चीन के शेन्सी और कांगसू प्रांत पर साम्यवादियों के शासन को स्वीकार किया गया और साम्यवादी सेना को चीन की राष्ट्रीय सेना का अंग मान लिया गया जिसे जापान के विरूद्ध महासेनापति च्यांग काई शेक के आदेशों का पालन करना था। इस प्रकार चीन में दो पृथक-पृथक सरकार इस समय विद्यमान थी। दोनों की अपनी-अपनी पृथक् सेनाएँ थी और दोनों अपने-अपने क्षेत्रों में अपने आदर्शों के अनुसार शासन और सामाजिक व्यवस्था के विकास में तत्पर थी। यह समझौता साम्यवादियों की शक्ति को बढ़ाने में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।