"आपेक्षिकता सिद्धांत": अवतरणों में अंतर

 
समीकरण (३) का विकास करके किसी भी प्रकार की गति के लिए इसी प्रकार की किंतु अत्यधिक संमिश्र पदसंहतियाँ मिलती हैं। इसके लिए निश्चलों (इन्वैरिएँट्स) और [[प्रदिश|प्रदिशों]] (टेन्सर्स) के सिद्धांतों की आवश्यकता होती है। मौलिक कल्पनाओं का इस रीति से विस्तार करने पर व्यापक आपेक्षिकता सिद्धांत में गुरुत्वाकर्षण स्वभावत: आता है। उसके लिए विशिष्ट परिकल्पनाओं की आवश्यकता नहीं हाती है।
 
===सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत के फलों का प्रमाण===
अनेक घटनाओं के फल, आइंस्टाइन प्रणीत व्यापक आपेक्षिकता सिद्धांत के अनुसार तथा न्यूटन प्रणीत प्रतिष्ठित याँत्रिकी के अनुसार, समान ही होते हैं। किंतु [[खगोलिकी]] में जब सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत का उपयोग किया गया तब तीन घटनाओं के फल प्रतिष्ठित याँत्रिकी (क्लासिकल मेकेनिक्स) के अनुसार निकले फलों से कुछ भिन्न रहे। इन फलों से सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत की कसौटी का काम ले सकते हैं। ये तीन फल इस प्रकार हैं:
 
*(१) अनेक वर्षों से यह ज्ञात था कि [[बुध]] ग्रह की प्रत्यक्ष कक्षा न्यूटन के सिद्धांतों के अनुसार नहीं रहती। गणना के पश्चात् यह प्रमाणित हुआ कि सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत के क्षेत्र समीकरणों के अनुसार बुध ग्रह की जो कक्षा आती है वह प्रेक्षित कक्षा (observed orbit) के अनुरूप है। उसी प्रकार पृथ्वी की प्रत्यक्ष कक्षा भी न्यूटन के सिद्धांतों के अनुसार नहीं हैं, किंतु पृथ्वी की कक्षा में त्रुटि बुध ग्रह की कक्षा की त्रुटि से बहुत कम है। तो भी कहा जा सकता है कि पृथ्वी की कक्षा की गणना में सामान्य आपेक्षिकता सिद्धान्त सफल रहा। अत: इस विशाल मापक्रमों की घटनाओं में जहाँ प्रतिष्ठित याँत्रिकी असफल थी वहाँ सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत सफल रहा।
 
*(२) सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत की दूसरी कसौटी [[प्रकाश]] की वक्रीयता है। प्रकाश की किरणें जब तीव्र गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में से होकर जाती हैं, तब सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत के अनुसार उनका पथ अल्प मात्रा में वक्र (टेढ़ा) हो जाता है। प्रकाश, ऊर्जा का ही एक स्वरूप है। अत: ऊर्जा एवं द्रव्यमान के संबंध के अनुसर प्रकाश में भी द्रव्यमान होता है और द्रव्यमान को आकर्षित करना गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र का गुण होने के कारण प्रकाशकिरण का पथ ऐसी स्थिति में थोड़ी मात्रा में टेढ़ा हो जाता है। इस फल की परीक्षा केवल सर्वसूर्यग्रहण के समय हो सकती है। किसी तारे का प्रकाश सूर्य के निकट से होकर निकले तो प्रकाश के मार्ग को अल्प मात्रा में वक्र हो जाना चाहिए और इसलिए तारे की आभासी स्थिति बदल जानी चाहिए। सामान्य आपेक्षिकता के इस फल को नापने का प्रयत्न १९१९, १९२२, १९२७, १९४७ इत्यादि वर्षों में सर्व सूर्यग्रहण के समय किया गया। पता चला कि प्रकाशकिरण के पथ की मापित वक्रता और व्यापक आपेक्षिकता सिद्धांत के अनुसार निकली वक्रता में इतना सूक्ष्म अंतर है कि हम यह कह सकते हैं कि ये प्रेक्षण सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत का समर्थन करते हैं।
 
*(३) सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत की तीसरी परीक्षा गुरुत्वाकर्षणीय क्षेत्र के कारण वर्ण-क्रम-रेखाओं (स्पेक्ट्रॉस्कोपिक लाइंस) का स्थानांतरण है। इस वाद के अनुसार जो तारे तीव्र गुरुत्वीय क्षेत्र में हैं उनके किसी विशेष तत्व के परमाणुओं से निकले प्रकाश का [[तरंगदैर्घ्य]] पृथ्वी के उसी तत्व के परमाणुओं के प्रकाश-तरंग-दैर्घ्य से अधिक होगा। अत: तारे के किसी एक तत्व के प्रकाश के वर्णक्रम और प्रयोगशाला में प्राप्त उसी तत्व के वर्णक्रम की तुलना से तरंगदैर्घ्य के परिवर्तन का मापन हो सकता है। अनेक निरीक्षणों के फल सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत के अनुरूप हैं, यद्यपि कुछ प्रेक्षकों ([[फ्ऱाएँडलिख़]] आदि) के अनुसार सब फल सामान्य आपेक्षिकता सिद्धांत के अनुरूप नहीं हैं।
 
== इन्हें भी देखें ==