"ख़ालसा" के अवतरणों में अंतर

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उपरोक्त परिस्थितयों तथा औरंगजेब और उसके नुमाइंदों के गैर-मुस्लिम जनता के प्रति अत्याचारी व्यवहार को देखते हुए धर्म की रक्षा हेतु जब गुरु गोबिंद सिंह ने सशस्त्र संघर्ष का निर्णय लिया तो उन्होंने ऐसे सिखों (शिष्यों) की तलाश की जो गुरमत विचारधारा को आगे बढाएं, दुखियों की मदद करें और ज़रुरत पढने पर अपना बलिदान देनें में भी पीछे ना हटें|
 
==इन्हें भी देखें====== खालसा पंथ साजने का चित्र ==
जब कोई धर्म आगे बढ़ता है तो उसके बहुत आम दीखता है की उसके अनुयायी बहुत हैं, ज्यादातर तो देखा-देखी हो जाते हैं, कुछ शरधा में हो जाते हैं, कुछ अपने खुदगर्जी के कारन हो जाते हैं, असल अनुयायी तो होते ही गिने चुने हैं | इस बात का प्रमाण आनंदपुर में मिला | जब सतगुर गोबिंद सिंह ने तलवार निकल कर कहा की ""उन्हें एक सिर चाहिये"" | सब हक्के बक्के रह गए | कुछ तो मौके से ही खिसक गए | कुछ कहने लग पड़े गुरु पागल हो गया है | कुछ तमाशा देखने आए थे | कुछ माता गुजरी के पास भाग गए की देखो तुमहरा सपुत्र क्या खिचड़ी पका रहा है |