"अमोघवर्ष नृपतुंग" के अवतरणों में अंतर

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[[चित्र:Jain Narayana temple at Pattadakal.JPG|right|thumb|300px|पट्टडकल का जैन नारायण मंदिर अमोघवर्ष नृपतुंग ने निर्मित कराया था।]]
'''अमोघवर्ष नृपतुंग''' या '''अमोघवर्ष प्रथम''' (800–878800 –- 878) [[भारत]] के [[राष्ट्रकूट राजवंश|राष्ट्रकूट वंश]] के महानतम शाशक थे। वे [[जैन धर्म]] के अनुयायी थे। इतिहासकारों ने उनकी शांतिप्रियता एवं उदारवादी धार्मिक दृष्टिकोण के लिये उन्हें [[सम्राट अशोक]] से तुलना की है। उनके शासनकाल में कई [[संस्कृत]] एवं [[कन्नड]] के विद्वानो को प्रश्रय मिला जिनमें महान गणितज्ञ [[महावीराचार्य]] का नाम प्रमुख है।
 
== परिचय ==
अमोघवर्ष राष्ट्रकूट राजा जो स. 814 ई. में गद्दी पर बैठा और 64 साल राज करने के बाद संभवत: 878 ईं. में मरा। वह [[गोविंद तृतीय]] का पुत्र था। उसके किशोर होने के कारण पिता ने मृत्यु के समय करकराज को शासन का कार्य सँभालने को सहायक नियुक्त किया था। किंतु मंत्री और सामंत धीरे-धीरे विद्रोही और असहिष्णु होते गए। साम्राज्य का गंगवाडी प्रांत स्वतंत्र हो गया और वेंगी के चालुक्यराज [[विजयादित्य द्वितीय]] ने आक्रमण कर अमोघवर्ष को गद्दी से उतार तक दिया। परंतु अमोघवर्ष भी साहस छोड़नेवाला व्यक्ति न था और करकराज की सहायता से उसने राष्ट्रकूटों का सिंहासन फिर स्वायत्त कर लिया। राष्ट्रकूटों की शक्ति फिर भी लौटी नहीं और उन्हें बार-बार चोट खानी पड़ी।
 
अमोघवर्ष के संजन [[ताम्रपत्र]] के अभिलेख से समकालीन भारतीय राजनीति पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है, यद्यपि उसमें स्वयं उसकी विजयों का वर्णन अतिरंजित है। वास्तव में उसके युद्ध प्राय: उसके विपरीत ही गए थे। अमोघवर्ष धार्मिक और विद्याव्यसनी था, महालक्ष्मी का परम भक्त। जैनाचार्य के उपदेश से उसकी प्रवृत्ति जैन हो गई थी। '[[कविराजमार्ग]]' और '[[प्रश्नोत्तरमालिका]]' का वह रचयिता माना जाता है। उसी ने [[मान्यखेट]] राजधानी बनाई थी। अपने अंतिम दिनों में राजकार्य मंत्रियों और युवराज पर छोड़ वह विरक्त रहने लगा था।
 
== बाहरी कड़ियाँ ==