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[[जैन धर्म]] और हिन्दू धर्म में जीव जीवित प्राणियों के लिए प्रयोग किया जाता है। ईश्वर और जीव विषयक भक्तिमार्गीमान्यता से भिन्न विश्वास परंपराएं भी हैं। वैदिक (औपनिषदिक), बौद्ध-जैन (श्रमण) एवं सूफी धर्म इसके उदाहरण हैं।
{{जैन धर्म}}
जैन धर्म और हिन्दू धर्म में जीव जीवित प्राणियों के लिए प्रयोग किया जाता है। ईश्वर और जीव विषयक भक्तिमार्गीमान्यता से भिन्न विश्वास परंपराएं भी हैं। वैदिक (औपनिषदिक), बौद्ध-जैन (श्रमण) एवं सूफी धर्म इसके उदाहरण हैं।
 
== हिन्दू धर्म==
{{हिन्दू धर्म}}
ब्रह्म एक ऐसी लोकोत्तर शक्ति है जो संपूर्ण ब्रह्मांड के कण-कण, क्षण-क्षण में व्याप्त है। यही लोकोत्तर शक्ति जब संसार की रचना करती है; सृष्टि का प्रवर्तन करती है; प्राणियों का संरक्षण करती है; उनका संहार करती है तो इसे ईश्वर की संज्ञा प्राप्त हो जाती है। ब्रह्म शब्द शक्तिपरकएवं सत्तापरकलोकोत्तर तत्त्‍‌व का बोधक है। ईश्वर और भगवान जैसे शब्द ऐसे लोकोत्तर तत्त्‍‌व की सृष्टि विषयक भूमिका का बोध कराते हैं। ईश्वर सर्वशक्तिमान एवं सर्वव्यापक है। वह असीम है, पूर्णत:स्वतंत्र है। जीव की स्थिति ईश्वर से भिन्न होती है। जीव अल्प शक्तिमान है; उसकी ज्ञान एवं क्रिया सीमा भी अति न्यून है। वह ससीम है, पराश्रित है, परतंत्र है, ईश्वराधीन है। जीव असंख्य है। ईश्वर और जीव के बीच भेद स्पष्ट करते हुए गोस्वामी तुलसीदास अपनी अमरकृतिरामचरितमानस में लिखते हैं-
 
 
अंग्रेजी भाषा में जीव के लिए क्रिएचर, ओर्गनिज्म शब्द प्रयुक्त होते हैं। इससे हिन्दू वेदान्त अथवा भगवद्गीता व अन्य दर्शन ग्रंथों में जगह जगह प्रयुक्त जीव शब्द को समझने में भ्रान्ति हो जाती है। जीव उपाधि युक्त ब्रह्म है अर्थात देह, मन, बुद्धि, अज्ञान आदि के कारण सीमित शक्ति वाला है, यह जीव आत्मा का अज्ञानमय स्वरूप है। इसकी उपस्थति से जीवन है अर्थात यह किसी प्राणी organismका जीवन सूत्र है। आत्मा आपकी अस्मिता है और पूर्ण शुद्ध ज्ञान स्वरूप है। परन्तु आत्मा जो अज्ञान से अपने वास्तविक स्वरूप को भुला बैठी है जीव कहलाती है।
 
सन्दर्भ -सरल वेदांत- बसंत प्रभात जोशी
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{{हिन्दू धर्म}}
{{वैदिक साहित्य}}