"जीव" के अवतरणों में अंतर

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(सुधार)
अर्थात् कुएं में मिट्टी का घडा है। घडे में जल है। जब तक घडे की सत्ता है, तब तक वह जल से भिन्न अवश्य है पर जब घडे की पृथक सत्ता समाप्त हो जाती है, तब वह संपूर्ण जल का एक अविभाज्य अंग बन जाता है। यही स्थिति जीव और ब्रह्म की है। अज्ञान की जंजीर से जकडे जीव को ही ब्रह्म से पृथक अपनी सत्ता की भ्रांति होती है। जब अज्ञान का पर्दा हट जाता है, तब जीव को यह प्रकाश मिलता है कि वह तो स्वयं ब्रह्म है। उपनिषदों में ऐसी सूक्तियांयथा सोऽहमस्मि (मैं वही हूं), शिवोऽहम् (मैं शिव हूं), अहं ब्रह्मास्मि (मैं ब्रह्म हूं), अयमात्माब्रह्म (यह आत्मा ही ब्रह्म है), तत्त्‍‌वमसि (तुम वही हो) जीव और ब्रह्म की अनन्यताका उद्घोष करती है।
 
==बौद्ध धर्म==
==बोद्ध==
बौद्धधर्म में नित्य सत्ता का निषेध किया जाता है। इस धर्म में यह माना जाता है कि सब कुछ चलनशीलहै, गतिशील है। चलनशीलताऔर गतिशीलता की ही सत्ता नित्य है। नित्य सत्ता का निषेध करके ईश्वरीय सत्ता को मान्यता नहीं दी जा सकती क्योंकि दोनों में तात्विकविसंगति है। इसी विसंगति के कारण बौद्धधर्म में ईश्वर जैसी किसी नित्य सत्ता का निषेध किया जाता है। वैसे, बौद्धधर्म परलोक में विश्वास करता है। इस धर्म में जीव की सत्ता तो है पर ईश्वर जैसे किसी नित्य तत्त्‍‌व के अभाव में दोनों के बीच भेद का प्रश्न ही नहीं उठता। इस धर्म में तथागत बुद्ध एवं ऐसे बोधिसत्त्‍‌वोंकी पूजा होती है जो निर्वाण की स्थिति में आ जाते हैं। जैन धर्म की मूल मान्यता है कि जगत्प्रवाहअनादि और अनंत हैं। इस धर्म में जगन्नियंता, जगत्स्त्र्रष्टाजैसी किसी लोकोत्तर सत्ता में विश्वास नहीं किया जाता है। जैन धर्म की मूल मान्यता है कि जीव यदि क्रमिक आध्यात्मिक उन्नयन करता रहे तो वह स्वयं अर्हत् हो जाता है; ईश्वरत्वको प्राप्त हो जाता है। इस धर्म में चौबीस तीर्थंकरोंको अर्हत् माना जाता है। ईश्वर के रूप में इनकी पूजा होती है। जैनधर्ममें भी ईश्वर और जीव के बीच भेद का प्रश्न नहीं उठता क्योंकि यहां जीव की सत्ता तो है पर लोकोत्तर ईश्वर की सत्ता का अभाव है।
 
अद्वैतवादी औपनिषदिक परंपरा, श्रमण परंपरा (बौद्ध-जैन) एवं सूफी परंपरा के अनुयायी ज्ञान मार्ग का अनुसरण करते हैं। ज्ञातव्य है कि भक्तिमार्ग का पथिक सेवक-सेव्य भाव अपनाकर परम लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है। इस मार्ग का पथिक स्वयं को सेवक और ईश्वर को सेव्य मानता है। इसी प्रकार ज्ञानमार्गका पथिक अपनी साधना के बल पर परम लक्ष्य (मोक्ष, निर्वाण, कैवल्य) की सिद्धि करता है; आत्मसाक्षातकरता है; परमसत्यका दर्शन करता है। अद्वैतमार्गानुगामीसाधक की दृष्टि में ईश्वर एवं जीव का भेद ही समाप्त हो जाता है। जीव ही ईश्वर का रूप धारण कर लेता है।
 
अंग्रेजी भाषा में जीव के लिए क्रिएचर, ओर्गनिज्म शब्द प्रयुक्त होते हैं। इससे हिन्दू वेदान्त अथवा भगवद्गीता व अन्य दर्शन ग्रंथों में जगह जगह प्रयुक्त जीव शब्द को समझने में भ्रान्ति हो जाती है। जीव उपाधि युक्त ब्रह्म है अर्थात देह, मन, बुद्धि, अज्ञान आदि के कारण सीमित शक्ति वाला है, यह जीव आत्मा का अज्ञानमय स्वरूप है। इसकी उपस्थति से जीवन है अर्थात यह किसी प्राणी organismका जीवन सूत्र है। आत्मा आपकी अस्मिता है और पूर्ण शुद्ध ज्ञान स्वरूप है। परन्तु आत्मा जो अज्ञान से अपने वास्तविक स्वरूप को भुला बैठी है जीव कहलाती है।
 
==सन्दर्भ==