"जैन धर्म में भगवान" के अवतरणों में अंतर

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== सिद्ध ==
[[चित्र:Siddha_Shila.svg|thumb|250px|[[जैनसिद्धशिला ब्रह्माण्डजहाँ विज्ञान]]सिद्ध अनुसारपरमेष्ठी सिद्धशिला](मुक्त आत्माएँ) विराजती है]
सभी अरिहंत अपने आयु कर्म के अंत होने पर सिद्ध बन जाते है। सिद्ध बन चुकी आत्मा जीवन मरण के चक्र से मुक्त होती है। अपने सभी कर्मों का क्षय कर चुके, सिद्ध भगवान अष्टग़ुणो से युक्त होते है।{{sfn|प्रमाणसागर|२००८|p=१४८}} वह सिद्धशिला जो लोक के सबसे ऊपर है, वहाँ विराजते है। 
सभी जीवों का लक्ष्य सिद्ध बनाना होना चाहिए। अनंत आत्माएँ सिद्ध बन चुकी है। जैन धर्म के अनुसार भगवंता किसी का एकाधिकार नहीं है और सही दृष्टि, ज्ञान और चरित्र से कोई भी सिद्ध पायापद जाप्राप्त कर सकता है। सिद्ध बनने केबन पश्चात,चुकी आत्मा लोक के किसी कार्य में दख़ल नहीं देती।
 
== पूजा ==