"जयप्रकाश नारायण" के अवतरणों में अंतर

उनका विवाह [[बिहार]] के प्रसिद्ध गांधीवादी [[बृज किशोर प्रसाद]] की पुत्री प्रभावती के साथ अक्टूबर 1902 मे हुआ। प्रभावती विवाह के उपरांत [[कस्तूरबा गांधी]] के साथ गांधी आश्रम मे रहीं। वे डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद और सुप्रसिद्ध गांधीवादी डॉ॰ अनुग्रह नारायण सिन्हा द्वारा स्थापित [[बिहार विद्यापीठ]] में शामिल हो गए। १९२९ में जब वे अमेरिका से लौटे, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम तेज़ी पर था। उनका संपर्क गांधी जी के साथ काम कर रहे [[जवाहर लाल नेहरु]] से हुआ। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बने। [[1932]] मे गांधी, नेहरु और अन्य महत्वपूर्ण कांग्रेसी नेताओ के जेल जाने के बाद, उन्होने भारत मे अलग-अलग हिस्सों मे संग्राम का नेतृत्व किया। अन्ततः उन्हें भी [[मद्रास]] में सितंबर 1932 मे गिरफ्तार कर लिया गया और [[नासिक]] के जेल में भेज दिया गया। यहाँ उनकी मुलाकात [[मीनू मसानी]], [[अच्युत पटवर्धन]], [[एन. सी. गोरे]], [[अशोक मेहता]], [[एम. एच. दांतवाला]], [[चार्ल्स मास्कारेन्हास]] और [[सी. के. नारायणस्वामी]] जैसे उत्साही कांग्रेसी नेताओं से हुई। जेल मे इनके द्वारा की गई चर्चाओं ने [[कांग्रेस सोसलिस्ट पार्टी]] (सी.एस.पी) को जन्म दिया। सी.एस.पी समाजवाद में विश्वास रखती थी। जब कांग्रेस ने 1934 मे चुनाव मे हिस्सा लेने का फैसला किया तो जेपी और सी.एस.पी ने इसका विरोध किया।
 
1939 मे उन्होंने [[द्वितीय विश्वयुद्ध]] के दौरान, अंग्रेज सरकार के खिलाफ लोक आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने सरकार को किराया और राजस्व रोकने के अभियान चलाए। [[टाटा स्टील कंपनी]] में हड़ताल करा के यह प्रयास किया कि अंग्रेज़ों को इस्पात न पहुंचे। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 9 महीने की कैद की सज़ा सुनाई गई। जेल से छूटने के बाद उन्होने गांधी और सुभाष चंद्र बोस के बीच सुलह का प्रयास किया। उन्हे बंदी बना कर मुंबई की आर्थर जेल और दिल्ली की कैंप जेल मे रखा गया। 1942 भारत छोडो आंदोलन के दौरान वे आर्थर जेल से फरार हो गए।
: ''मुझे अपने लिए चिंता नहीं है, किंतु देश के लिए मुझे चिंता है।'' -- बिहार विभूति डॉ॰ अनुग्रह नारायण सिन्हा
उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हथियारों के उपयोग को सही समझा। उन्होंने [[नेपाल]] जा कर [[आज़ाद दस्ते]] का गठन किया और उसे प्रशिक्षण दिया। उन्हें एक बार फिर [[पंजाब]] में चलती ट्रेन में सितंबर 1943 मे गिरफ्तार कर लिया गया। 16 महीने बाद जनवरी 1945 में उन्हें आगरा जेल मे स्थांतरित कर दिया गया। इसके उपरांत गांधी जी ने यह साफ कर दिया था कि [[डॉ॰ लोहिया]] और जेपी की रिहाई के बिना अंग्रेज सरकार से कोई समझौता नामुमकिन है। दोनो को अप्रेल 1946 को आजाद कर दिया गया।
[[चित्र:J P Narayan.JPG|right|thumb|300px|१९५८ में इजराइल के प्रधानमन्त्री डेविड बेन गुरिओन के साथ [[तेल अवीब]] में जयप्रकाश जी]]
 
1948 मे उन्होंने कांग्रेस के समाजवादी दल का नेतृत्व किया और बाद में गांधीवादी दल के साथ मिल कर [[समाजवादी सोशलिस्ट पार्टी]] की स्थापना की। [[19 अप्रेल]], [[1954]] में [[गया]], [[बिहार]] मे उन्होंने [[विनोबा भावे]] के [[सर्वोदय आंदोलन]] के लिए जीवन समर्पित करने की घोषणा की। [[1957]] में उन्होंने लोकनीति के पक्ष मे राजनीति छोड़ने का निर्णय लिया।