"पुरुषार्थ" के अवतरणों में अंतर

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== सन्दर्भ ==
'''जीवन के चार पुरुषार्थ हैं धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष
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तुला एक प्रकार का यंत्र है, जिसके द्वारा किसी वस्तु की संहति या उसका भार ज्ञात किया जा सकता है। तुला का शाब्दिक अर्थ है बराबर या समान किया हुआ। चूंकि तुला के दोनों पलड़ों पर गुरुत्वाकर्षण की शक्ति समान रूप से कार्य करती है, इसलिए तुला तभी समान होगी, जब दोनों पलड़ों पर समान भार हो। तुला का यह सिद्धांत हमारे जीवन में बड़ा ही महत्वपूर्ण है। जीवन के चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष हैं।
 
[[श्रेणी:हिन्दू धर्म]]
मोक्ष मन की शांति पर निर्भर करता है। मन को शांति तभी मिलती है, जब मन पूर्णरूप से स्थिर हो। मन तभी स्थिर होगा जब धर्म, अर्थ व काम में संतुलन स्थापित हो। यह संतुलन स्थापित करना है अर्थ और काम के बीच। अर्थ है ज्ञान शक्ति व धन का अर्जन और काम है उसका उपयोग। जब अर्थ और काम दोनों ही धर्म से बराबर प्रभावित होंगे, तभी उनमें संतुलन होगा। तभी मन को शांति मिलेगी और आत्मा को मोक्ष मिलेगा। एक विद्यार्थी जो शिक्षा अर्जन में 'क्या' और 'कैसे' के उत्तर समझ लेता है, वह हमेशा अपने अभ्यास में सफल होता है। उसका जीवन संतुलित होता है और उसे शक्ति मिलती है।
[[श्रेणी:हिन्दू दर्शन]]
 
वहीं जो व्यक्ति समझ के बगैर मात्र परीक्षा में पास होने को ही अपना लक्ष्य बनाता है, वह पास होने पर भी उपार्जन में सफल नहीं होता। ऐसा इसलिए, क्योंकि उसकी सफलता में नैतिक आधार ही नहीं है। इसलिए उसका जीवन संतुलित नहीं होता और वह शांति भी नहीं प्राप्त कर पाता है।1इसी तरह समाज में रहने वाला प्राणी यदि समाज, परंपराओं और प्रकृति के नियमों को समझकर समाज के अनुकूल चलता है, तो वह अपने आप को संतुलित रख पाता है और शांति को प्राप्त होता है। न्यायालय की तुला भी इसी बात की द्योतक है। इसी प्रकार एक योगी यदि यम और नियम के आधार पर अपने आहार-विहार और प्राणायाम में संतुलन स्थापित कर लेता है, तो आगे की ध्यान और धारणा की सीढि़यां, वह आसानी से चढ़ लेता है और अपने आपको संतुलित रख पाता है। वह समाज में निर्लिप्त जीवन जीता है और शांति से जीवन जीता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति तुला के संतुलन को समझकर अपने जीवन में सामंजस्य स्थापित करता है उसे जीवन में शांति मिलती है।
यह संसार विचारो का ही प्रतिरूप है! विचार सूक्ष्म होते है!संसार की सथुल वस्तुओ की रचना पहले किए गए विचार के अनुसार ही होता है!दर्शनशास्त्र के अनुसार यह समस्त जगत परमात्मा के एक विचार का ही परिणाम है! संसार मे जो उन्नति , प्रगति और नए-नए परिवर्तन दिखाई पड़ते है , वे सब विचारो के ही परिणाम है! अथर्ववेद मे कहा गया है- "त्वं नो मेधेप्रथमा" ! अर्थात सही विचार ही संसार की सर्वश्रेष्ठ वस्तु है! विचार उत्पन्न करने का यंत्र हमारा दिमाग है! विचार की रचना परमाणु द्वारा हुई है! यह आकाश मे व्याप्त ईश्वर तत्व के सूक्ष्म कण्ण समूह है, जिनकी रचना मन के अदृश्य स्तर मे होती है!ईश्वर पदार्थ समग्र ब्रह्माण्ड मे प्रचुरता से व्याप्त है! विचार तथा कर्म के उचित समन्वय द्वारा ही मनुष्य को कर्म का ध्येय की प्रप्ति होती है!