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[[जैन दर्शन]] के अनुसार स्थूल भौतिक पदार्थ '''पुद्गल''' कहलाता है क्योंकि यह अणुओं के संयोग (दूरयंति) और वियोग (गलंति च) का खेल है। [[बौद्ध दर्शन|बौद्ध धर्मदर्शन]] में आत्मा को पुद्गल कहते हैं। यह पाँच स्कंधों- रूप, वेदना, संस्कार, संज्ञा और विज्ञान का ऐसा समूह है जो निर्वाण की अवस्था में विशीर्ष हो जाता है।
 
==व्युत्पत्ति==
पुद्गल शब्द की रचना दो अंगों से हुई हैं।
<blockquote>दूरयंति गलंति च</blockquote>
इसका संस्कृत एवं पाकृत में अर्थ हैं - "जो उत्पन्न होता हैं और गल जाता हैं"। आंशिक रूप से अंग्रेजी में पुद्गल को '''मैटर''' कहा जा सकता हैं, पर पाश्चात्य [[विज्ञान]] और [[जैन दर्शन]] में अणु की परिभाषा में भेद हैं, जिससे पुद्गल का भी मैटर कहा जाना संदिग्ध हैं।
 
[[श्रेणी:भारतीय दर्शन]]
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