"जैन धर्म में भगवान" के अवतरणों में अंतर

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{{स्रोत कम|date=सितंबर 2015}}
{{जैन धर्म}}
[[जैन धर्म]] इस ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति, निर्माण या रखरखाव के लिए जिम्मेदार एक निर्माता देवताइश्वर केकी विचारधारणा को खारिज करता है।{{sfn|शास्त्री|२००७|p=८७}} [[जैन दर्शन]] के अनुसार, यह लोक और इसके छह द्रव्य ([[जीव]], [[पुद्गल]], आकाश, काल, धर्म, और अधर्म) हमेशा से है और इनका अस्तित्व हमेशा रहेगा। यह सब स्वयं संचालित है और सार्वभौमिक प्राकृतिक क़ानूनों पर चलता है। इसके अनुसार भगवान, एक अमूर्तिक वस्तु एक मूर्तिक वस्तु (ब्रह्माण्ड) का निर्माण नहीं कर सकती। [[जैन ब्रह्माण्ड विज्ञान]] देवों (स्वर्ग निवासियों) का एक विस्तृत विवरण प्रदान करता है, लेकिन इन प्राणियों को रचनाकारों के रूप में नहीं देखा जाता है; वे दुख के अधीन हैं और अन्य सभी जीवित प्राणियों की तरह, अपनी आयु पूरी कर अंत में मर जाते है। जैन धर्म के अनुसार इस सृष्टि को किसी ने नहीं बनाया।
 
जैन धर्म के अनुसार हर आत्मा का असली स्वभाव भगवंता है और हर आत्मा में अनंत शक्ति, अनंत ज्ञान और अनंत शांति है। आत्मा के कर्मों के बंध के कारण यह गुण प्रकट नहीं हो पाते। जैन दर्शन के अनुसार, कर्म प्रकृति के मौलिक कण होते हैं। सम्यक् दर्शन, [[सम्यक् ज्ञान]], सम्यक् चरित्र के माध्यम से आत्मा के इस राज्य को प्राप्त किया जा सकता है। इन रतंत्रय के धारक को भगवान कहा जा सकता है। एक भगवान, इस प्रकार एक मुक्त आत्मा हो जाता है - दुख से मुक्ति, पुनर्जन्म, दुनिया, कर्म और अंत में शरीर से भी मुक्ति। इसे निर्वाण या मोक्ष कहा जाता है। इस प्रकार, जैन धर्म में अनंत भगवान है, सब बराबर, मुक्त, और सभी गुण की अभिव्यक्ति में अनंत हैं। 
जिन्होंने चार घातिया कर्मों का क्षय कर दिया वह, अरिहन्त कहलाते है।{{sfn|प्रमाणसागर|२००८|p=१४८}} समस्त कशायों (जैसे क्रोध, मान, माया, लोभ) को नाश कर [[केवल ज्ञान]] प्राप्त करने वाले व्यक्ति अरिहन्त कहलाते है। इन्हें [[केवली]] भी का जाता है। अरिहन्त दो प्रकार के होते है:
# '''सामान्य केवली'''- जो अपना कल्याण करते है।
# '''तीर्थंकर'''- २४ महापुरुष जो अन्य जीवों को मोक्ष मार्ग का उपदेश देते है।{{साँचा:Sfn|Rankin|2013|p = 40}}
 
== तीर्थंकर ==
== सिद्ध ==
[[चित्र:Siddha_Shila.svg|thumb|250px|सिद्धशिला जहाँ सिद्ध परमेष्ठी (मुक्त आत्माएँ) विराजती है]]
सभी अरिहंत अपने आयु कर्म के अंत होने पर सिद्ध बन जाते है। सिद्ध बन चुकी आत्मा जीवन मरण के चक्र से मुक्त होती है। अपने सभी कर्मों का क्षय कर चुके, सिद्ध भगवान अष्टग़ुणो से युक्त होते है।{{sfn|प्रमाणसागर|२००८|p=१४८}} वह सिद्धशिला जो लोक के सबसे ऊपर है, वहाँ विराजते है। अनंत आत्माएँ सिद्ध बन चुकी है। जैन धर्म के अनुसार भगवंता किसी का एकाधिकार नहीं है और सही दृष्टि, ज्ञान और चरित्र से कोई भी सिद्ध पद प्राप्त कर सकता है। सिद्ध बन चुकी आत्मा लोक के किसी कार्य में दख़ल नहीं देती। सिद्ध देहरहित होते हैं।{{sfn|शास्त्री|२००७|p=८२}}
सभी जीवों का लक्ष्य सिद्ध बनाना होना चाहिए।{{Fact|date=November 2015}} अनंत आत्माएँ सिद्ध बन चुकी है। जैन धर्म के अनुसार भगवंता किसी का एकाधिकार नहीं है और सही दृष्टि, ज्ञान और चरित्र से कोई भी सिद्ध पद प्राप्त कर सकता है। सिद्ध बन चुकी आत्मा लोक के किसी कार्य में दख़ल नहीं देती।
 
== पूजा ==
* {{citation|last=प्रमाणसागर|first=मुनि|title=जैन तत्त्वविद्या|year=२००८|publisher=भारतीय ज्ञानपीठ|url=https://books.google.co.in/books?id=kKqDPzCrwf0C&dq=Jain+Tattvavidya&source=gbs_navlinks_s|isbn=978-81-263-1480-5}}
* {{साँचा:Citation|last = Sangave|first = Vilas Adinath|title = Aspects of Jaina religion|url = http://books.google.com/books?id=8UhvGRoyAqMC|edition = 3rd|year = 2001|publisher = Bharatiya Jnanpith|isbn = 81-263-0626-2}}
* {{साँचा:Citation|last = Rankinशास्त्री |first = Aidanप. कैलाशचन्द्र |title = Livingजैन Jainism: An Ethical Science|url = https://books.google.co.in/books?id=bQxZAQAAQBAJधर्म|year = 2013२००७|publisher = Johnआचार्य Huntशंतिसागर Publishing'छाणी' स्मृति ग्रन्थमाला|isbn = 97881-1780999111|chapter = Chapter 1. Jains Jainism and Jainness902683-8-4}}
 
[[श्रेणी:जैन धर्म]]